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जाने-माने फिल्म संपादक श्रीकर प्रसाद ने 53वे भारतीय अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव के मास्टरक्लास में ‘टू कट ऑर नॉट टू कट’ में संपादन की बारीकियों पर महत्वपूर्ण विचार साझा किए

जाने-माने फिल्म संपादक ए श्रीकर प्रसाद ने 53वे भारतीय अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव के अवसर पर आज गोवा में आयोजित मास्टरक्लास ‘टू कट ऑर नॉट टू कट’ में फिल्म संपादन की बारीकियों पर महत्वपूर्ण विचार साझा किए।

श्री प्रसाद ने अपने लक्षित दर्शकों को जानने के महत्व के बारे में बातचीत करते हुए कहा कि फिल्म निर्माताओं को और विशेष रूप से युवा फिल्म निर्माताओं को अपने दर्शकों को अच्छी तरह से जानने की आवश्यकता है। लक्षित दर्शकों को अच्छी तरह से जानने से फिल्म की सफलता सुनिश्चित करने में सहायता मिलती है। अधिकतर फिल्मों में, आनंद अंत में मिलता है और जब फिल्म सफल हो जाती है और दर्शकों द्वारा पसंद की जाती है।

फिल्मों में अतिशयोक्ति के बारे में बातचीत करते हुए श्री प्रसाद ने कहा कि अतिशयोक्ति का स्तर फिल्म और कलाकारों के अनुसार बदलता रहता है। उन्होंने कहा कि स्टार फिल्मों में हम प्रशंसकों को खुश करने के लिए लम्हों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करते हैं, स्तर अलग-अलग हो सकता है। उन्होंने कहा कि फिल्म का आनंद प्रदान करने के लिए इसमें तेज़ी आती है, आप इसे विभाजित नहीं कर सकते, यह महत्वपूर्ण है कि अतिशयोक्ति न करें और वास्तविकता को प्रस्तुत करें।

संपादन के अपने अनुभव के बारे में जानकारी देते हुए श्री प्रसाद ने कहा कि हर अनुभव दूसरे अनुभव की ओर लेकर जाता है। यह आपको सिखाता है कि क्या करना है और क्या नहीं करना है। यह हर बार कुछ ना सीखने का अनुभव होना चाहिए। हार मान लेना बहुत आसान है लेकिन लक्ष्य की ओर काम करना और उसे हासिल करना ज्यादा चुनौतीपूर्ण होता है।

प्रसाद ने विभिन्न कोणों और कई कैमरों के साथ कवरेज तकनीक और संपादन पर इसके प्रभाव के बारे में बोलते हुए कहा कि छोटे फिल्म निर्माता तब तक कट की कल्पना नहीं कर सकते जब तक वे कटिंग टेबल पर नहीं बैठते। कई निर्देशकों को संपादन कक्ष का अनुभव नहीं होता है। फिल्म निर्माताओं के पास पहले वह अनुभव होना अनिवार्य था ताकि उनके निर्देशन को बेहतर बनाया जा सके। अब, हम संपादन कक्ष में बाद में पहुँचते हैं, लेकिन अब विशेष रूप से सॉफ़्टवेयर की सहायता से और अधिक संपादित करने की गुंजाइश है, लेकिन सही चीज़ को बाहर निकालना कठिन होता है।

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फिल्म में पॉज (हल्का ठहराव) के महत्व के बारे में बताते हुए प्रसाद ने कहा, ‘हल्का ठहराव या अंतराल एक भारतीय अवधारणा है, लेकिन आमतौर पर दक्षिणी फिल्मों में अंतराल शॉट्स के बीच नहीं बल्कि पूरी कहानी में होता है। संपादकों के लिए टाइमिंग को समझना महत्वपूर्ण है। प्रत्येक स्थिति की अपनी टाइमिंग होती है। सही समय पर कट जरूरी है और यह एक विशेष प्रभाव छोड़ता है। किसी खास दृश्य में कटौती स्थिति पर निर्भर करती है और स्थिति की मांग के अनुसार इस बारे में निर्णय लेना होता है। दृश्य में कभी-कभी जवाब देने की अपेक्षा नहीं की जाती है, ऐसे में उस क्षण या दृश्य को अधिक प्रभावशाली बनाने के लिए पॉज का सहारा लिया जाता है। हो सकता है कि अभिनेता ने जरूरी विराम न लिया हो, लेकिन दृश्य की प्रभावशालीता को बनाए रखने के लिए हम पॉज को बढ़ाते हैं। एक के बाद एक संवाद दर्शकों के दिमाग पर भारी पड़ सकते हैं, दर्शक दृश्य के उस पल को महसूस करना चाहता है, इसलिए उन्हें इसमें डूबने के लिए समय चाहिए जो पॉज से ही संभव है। जैसा कि जोक में होता है, दर्शकों को भावनाओं को समझने और महसूस करने के लिए समय देना होगा।’

श्री प्रसाद ने आगे बताया कि, ‘ये सभी चीजें एडिटिंग का काम सुचारू रूप से करने में बहुत बड़ी भूमिका निभाती हैं। साइलेंट सीक्वेंस प्रभावशाली होते हैं और इससे जुड़ी हुई भावना उभरती हैं और बैकग्राउंड म्यूजिक के साथ, इसमें इमोशन भी होता है। किसी फिल्म के एक ही सीक्वेंस के दो संस्करण दिखाते हुए श्री प्रसाद ने समझाया कि निर्देशक दृश्य को अधिक प्रभावशाली बनाने के लिए कैसे लंबे पॉज का इस्तेमाल करते हैं।

दर्शक के एक प्रश्न का उत्तर देते हुए कि गानों की शूटिंग के दौरान किन बातों का ध्यान रखना चाहिए श्री प्रसाद ने कहा कि, ‘गीत हमेशा से फिल्मी इतिहास का हिस्सा रहे हैं और इसका इस्तेमाल विजुअल हाई देने के लिए किया जाता है। पहले गीतों को कहानी कहने के एक हिस्से के रूप में इस्तेमाल किया जाता था लेकिन अब हम फिल्म निर्माण के एक ऐसे बिंदु पर आ गए हैं जहां गीत के माध्यम से दृश्यों का सहारा लेकर हम कहानी दिखाते हैं। फिल्मों में गानों की संख्या अब धीरे-धीरे कम हो गई है। इसके पीछे का आइडिया यह है कि कहानी कैसे बेहतरीन तरीके से प्रवाहित हो सकती है।‘

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एक अन्य सवाल कि उन्हें कैसे पता चलता है कि उन्होंने एक संपादक के रूप में अच्छा काम किया है, इसके जवाब में श्री प्रसाद ने कहा ‘मुझे नहीं पता कि किसी को आकर मुझे बताने की जरूरत है। जब मैं कई लोगों के साथ काम करता हूं तो खुले दिमाग से काम करता हूं और निर्देशक वह होता है, जिसे यह अनुभव करना चाहिए कि काम अच्छा है।

क्लाइमेक्स संबंधित प्रक्रिया पर एक सवाल के जवाब में श्री प्रसाद ने कहा, ‘क्लाइमेक्स कहानी का चरमबिंदु है और एक बड़ी भूमिका निभाता है। अगर क्लाइमेक्स अच्छा नहीं है तो पूरी फिल्म अधूरी है। भारतीय सिनेमा में दुर्भाग्य से हमारे पास दो क्लाइमेक्स हैं, एक इंटरवल (मध्यांतर) पर और दूसरा अंत में। एक इंटरवल हाई की जरूरत होती है और कभी-कभी यह इतना अच्छा होता है कि पहले हिस्से को दूसरे हिस्से से बेहतर माना जाता है। क्लाइमेक्स आखिरी दृश्य है, जो दर्शकों के साथ जाता है।’

श्री प्रसाद ने ओटीटी के लिए संपादन शैलियों के बारे में विस्तार से बताया। उन्होंने कहा कि यह इस बात पर निर्भर करता है कि यह फिल्म है या सीरिज। सीरिज के लिए एक अलग लेखन शैली है। इसके लेखन का प्रारूप इस तरह से है कि हर एपिसोड क्लिफ हैंगर (रोमांचक रचना) है और हमें कई इंटरवल या क्लाइमेक्स को लेकर तैयार रहने की जरूरत होती है।

 

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