सुपरवाइजर के घर पर अभी भी बैगारी कर रहे कर्मचारी, प्रशासन ने मूंदी आंखें

सुपरवाइजर के घर पर अभी भी बैगारी कर रहे कर्मचारी, प्रशासन ने मूंदी आंखें

स्टेशन प्रताप टाउनशिप में जारी है 'बैगारी' का खेल; नैतिकता का पाठ पढ़ाने वाले अधिकारियों की चुप्पी पर उठे सवाल

कोटा। रेलवे में अनुशासन और जीरो टॉलरेंस की बातें केवल फाइलों तक सीमित नजर आ रही हैं। स्टेशन प्रताप टाउनशिप स्थित रेलवे इंजीनियरिंग विभाग के एक सुपरवाइजर के निजी आवास पर बुधवार को भी 'बेगारी' की तस्वीरें देखने को मिलीं। खबर प्रकाशित होने और वीडियो वायरल होने के बावजूद, प्रशासन की "आंखें मूंदने" की प्रवृत्ति ने कर्मचारियों के बीच भारी असंतोष पैदा कर दिया है।

🚫 धड़ल्ले से जारी है घरेलू काम

हैरानी की बात यह है कि मामला सुर्खियों में आने के बाद भी सुपरवाइजर के हौसले बुलंद हैं। बुधवार को भी कर्मचारी:

  • घर के मेन गेट और परिसर की साफ-सफाई करते नजर आए।

  • फील्ड ड्यूटी (ट्रैक मेंटेनेंस) छोड़कर सब्जी लाने, वाहन धोने और कपड़े धोने जैसे निजी कामों में व्यस्त रहे।

  • प्रशासन ने इस पर संज्ञान लेना तो दूर, प्रारंभिक जांच तक शुरू करने की जहमत नहीं उठाई।

"भांग पूरे कुएं में घुली है": अधिकारियों पर भी संदेह

रेलवे गलियारों में चर्चा है कि छोटे कर्मचारियों को नैतिकता और ड्यूटी का पाठ पढ़ाने वाले, और छोटी-छोटी गलतियों पर सस्पेंशन, ट्रांसफर या चार्जशीट की धमकी देने वाले बड़े अधिकारी खुद इस 'प्रथा' का हिस्सा हैं।

  • साझा लाभ: चर्चा यह है कि जब बड़े अधिकारियों के बंगलों पर भी कर्मचारी इसी तरह की 'सेवा' दे रहे हैं, तो वे एक सुपरवाइजर के खिलाफ कार्रवाई कर अपनी ही सुविधा पर संकट क्यों मोल लेंगे?

  • जांच पर सवाल: यही कारण है कि 'कोटा रेल न्यूज़' के पुख्ता वीडियो साक्ष्यों के बावजूद प्रशासन पूरी तरह निष्क्रिय बना हुआ है।

🪧 कर्मचारियों में बढ़ता आक्रोश

रेलवे के ग्रुप-सी और डी स्तर के कर्मचारियों का कहना है कि एक तरफ प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) और रेलवे बोर्ड 'बेगारी' खत्म करने के आदेश जारी कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ कोटा मंडल में इसे खुलेआम संरक्षण दिया जा रहा है।

  • कार्यक्षमता पर असर: फील्ड में काम करने वाले कर्मचारियों की कमी के कारण रेल संरक्षा (Safety) पर बुरा असर पड़ रहा है, क्योंकि आधे कर्मचारी अधिकारियों के निजी कामों में व्यस्त हैं।

  • नैतिक पतन: कर्मचारियों का कहना है कि प्रशासन का यह रवैया "चोर-चोर मौसेरे भाई" वाली कहावत को चरितार्थ कर रहा है।

अब देखना यह है कि क्या रेलवे बोर्ड या डीआरएम (DRM) कोटा इस खुलेआम चल रही अनुशासनहीनता पर कोई कड़ा प्रहार करते हैं, या फिर यह मामला भी पुरानी फाइलों की तरह दबा दिया जाएगा।


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