नई दिल्ली, संविधान के 75 वर्ष पूरे होने के अवसर पर संसद के शीतकालीन सत्र में संविधान पर चर्चा आयोजित की गई। हालांकि, यह चर्चा संसद में जारी अव्यवस्था और राजनीतिक स्वार्थों के कारण महज औपचारिकता बनकर रह गई। 25 नवंबर को शुरू हुए इस सत्र का उद्देश्य संविधान दिवस को खास तौर पर मनाना और लोकतंत्र की इस मूलभूत धरोहर पर विचार-विमर्श करना था। लेकिन संसद के दोनों सदन लगातार हंगामे की भेंट चढ़े हुए हैं।
संसद नहीं चलने पर सवाल
संसद में गतिरोध की स्थिति ने इस चर्चा के महत्व को सवालों के घेरे में खड़ा कर दिया है। संसद, जो लोकतंत्र की आत्मा है, राजनीतिक स्वार्थों के चलते सुचारू रूप से नहीं चल पा रही है। एक ओर, संविधान पर चर्चा की जा रही थी, वहीं दूसरी ओर राज्यसभा के सभापति जगदीप धनखड़ को यह कहने पर मजबूर होना पड़ा कि उन्हें बार-बार अपमानित किया जा रहा है। ऐसी स्थिति में, संविधान पर चर्चा के वास्तविक मायने पर गंभीर प्रश्न उठ खड़े होते हैं।
राजनीतिक एजेंडों की भरमार
13 और 14 दिसंबर को लोकसभा में संविधान पर हुई चर्चा में यह स्पष्ट दिखाई दिया कि सभी दलों ने इसे अपने-अपने राजनीतिक एजेंडों को आगे बढ़ाने का मंच बना लिया। केंद्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने अपने संबोधन में कांग्रेस के शासनकाल में अनुच्छेद 356 के दुरुपयोग पर सवाल उठाए। वहीं, कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी ने अपनी कहानियों के माध्यम से भाजपा सरकार को आड़े हाथों लिया।
समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव ने तो यह तक कहा कि यदि विपक्ष को 236 सीटें नहीं मिलतीं, तो भाजपा संविधान को बदल देती। टीएमसी सांसद कल्याण बनर्जी और डीएमके व आप के सांसदों ने अपने-अपने क्षेत्रों की उपलब्धियां गिनाने तक अपने भाषण सीमित रखे।
मतपत्र और ईवीएम पर बहस
वायनाड से जीत दर्ज करने वाली प्रियंका गांधी ने चर्चा के दौरान ईवीएम को भाजपा की जीत से जोड़ दिया। उन्होंने कहा कि यदि मतपत्र से चुनाव कराया जाए, तो भाजपा हार जाएगी। विपक्षी नेताओं ने अपने संबोधनों में संविधान की रक्षा का श्रेय विपक्ष को दिया और यह भी कहा कि भाजपा के कारण संविधान को खतरा है।
सभापति का अपमान और अव्यवस्था
राज्यसभा के सभापति जगदीप धनखड़ को बार-बार अपमानित किए जाने की शिकायत करनी पड़ी। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि जिस सदन में संविधान पर चर्चा हो रही हो, वहां उसके संरक्षक को अपमान का सामना करना पड़े। संसद की ऐसी स्थिति संविधान के प्रति प्रतिबद्धता पर सवाल खड़े करती है।
संविधान दिवस का असली संदेश खो गया
संविधान, किसी भी लोकतांत्रिक देश का सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेज है। भारत के संविधान ने 75 वर्षों से देश को दिशा दी है, और यह हमारे लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत है। लेकिन, संसद की मौजूदा स्थिति यह दिखाती है कि संविधान पर चर्चा केवल औपचारिकता बनकर रह गई है। यह विडंबना है कि जिस संविधान ने सभी दलों को समान अधिकार दिए, उसी के नाम पर राजनीतिक स्वार्थ साधे जा रहे हैं।
निष्कर्ष
संसद का यह सत्र संविधान की ताकत और इसकी प्रासंगिकता को रेखांकित करने का अवसर था, लेकिन यह राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप में उलझकर रह गया। संसद के सदस्यों को आत्ममंथन करने की आवश्यकता है कि वे संविधान के 75 वर्ष पूरे होने पर चर्चा के माध्यम से इसे मजबूत कर रहे हैं या कमजोर। जब संसद ही नहीं चल पा रही, तो संविधान पर चर्चा के मायने भी धूमिल हो जाते हैं।
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