सीकर/कोटपूतली बहरोड़/जयपुर: आधुनिकता की दौड़ में भागते भारतीय समाज में रिश्तों की डोर कमजोर होती जा रही है। 16 मई को सामने आई दो हृदयविदारक घटनाओं ने इस कड़वी सच्चाई को उजागर कर दिया। सीकर के मुकुंदगढ़ में बीमारी और आर्थिक तंगी से जूझ रहे तीन बेटों वाले 80 वर्षीय श्यामसुंदर दर्जी और उनकी 75 वर्षीय पत्नी चंद्रकला ने अकेलेपन और अनदेखी से परेशान होकर आत्महत्या कर ली। वहीं, कोटपूतली बहरोड़ जिले के लीला का बास ढाणी में 80 वर्षीय मां भंवरी देवी का अंतिम संस्कार तब हो पाया, जब उनके सात बेटों में से एक ने चिता पर लेटकर चांदी के कड़ों की मांग की। ये घटनाएं सोचने पर मजबूर करती हैं कि आखिर हमारा समाज किस दिशा में जा रहा है और क्या लालची पुत्र कभी बुजुर्ग नहीं होंगे?
मुकुंदगढ़ के वार्ड 16 में दर्जी दंपत्ति का शव 15 मई को उनके घर में मिला। उन्होंने अपने सुसाइड नोट में बीमारी और आर्थिक तंगी को अपनी मौत का कारण बताया और अपने तीनों बेटों को दोषमुक्त कर दिया। लेकिन यह सवाल उठता है कि क्या वास्तव में उनके बेटे निर्दोष हैं? बुजुर्ग दंपत्ति के दो बेटे जयपुर और एक बेटा बैंगलोर में अच्छी जिंदगी जी रहे थे। क्या समर्थ बेटों के होते हुए उनके माता-पिता को गांव में अकेले, बीमारी और आर्थिक तंगी से जूझना चाहिए था? यह उन बेटों के लिए एक शर्मनाक सवाल है। तीन-तीन बेटों के जीवित रहते हुए भी माता-पिता को मौत को गले लगाना पड़ा, यह हमारे समाज की एक दुखद तस्वीर पेश करता है। क्या उन तीन बेटों में से एक भी अपने बुजुर्ग माता-पिता को अपने साथ रखने की जिम्मेदारी नहीं उठा सका?
दूसरी ओर, कोटपूतली बहरोड़ जिले की घटना और भी विचलित करने वाली है। जब 80 वर्षीय भंवरी देवी की चिता को अग्नि दी जा रही थी, तभी उनके पांचवें नंबर के पुत्र ओम प्रकाश ने मां की चिता पर लेटकर उनके पैरों के चांदी के कड़ों की मांग शुरू कर दी। सात बेटों की मां भंवरी देवी के अंतिम संस्कार में उनके ही पुत्र का यह लालची रवैया देखकर हर कोई स्तब्ध था। ओम प्रकाश का आरोप था कि अन्य भाइयों ने मां का सारा सामान हड़प लिया है, इसलिए उसे कम से कम चांदी के कड़े तो मिलने ही चाहिए। उसने ग्रामीणों को साफ कह दिया कि जब तक उसे चांदी के कड़े नहीं मिलेंगे, वह चिता पर ही लेटा रहेगा। आखिरकार, गांव वालों के दबाव और समझाने के बाद अन्य भाइयों ने ओम प्रकाश को चांदी के कड़े दिए, जिसके बाद ही मां का अंतिम संस्कार संपन्न हो सका।
ये दोनों घटनाएं भारतीय समाज में बुजुर्गों की दयनीय स्थिति और रिश्तों में घटते मानवीय मूल्यों को दर्शाती हैं। वे बुजुर्ग वास्तव में भाग्यशाली हैं जो अपने बच्चों के साथ स्नेह और सम्मान के साथ रह रहे हैं। लेकिन उन बुजुर्गों की पीड़ा असहनीय है जिनके पुत्र महानगरों या विदेशों में अपनी दुनिया में मस्त हैं और अपने माता-पिता की देखभाल करने की जिम्मेदारी से मुंह मोड़ लेते हैं। यह सोचना होगा कि क्या ये लालची पुत्र कभी बूढ़े नहीं होंगे और क्या उन्हें अपने कर्मों का फल नहीं मिलेगा? यह घटनाएं हमारे समाज के लिए एक गहरा सबक हैं, जिस पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है।
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