सीएम अशोक गहलोत को अखबारों में विज्ञापन देने के बजाए शिविरों की हकीकत का पता लगाना चाहिए।

सीएम अशोक गहलोत को अखबारों में विज्ञापन देने के बजाए शिविरों की हकीकत का पता लगाना चाहिए।

जब योजना क्षेत्र के भूखंडों के फ्री होल्ड के पट्टे ही नहीं मिल रहे हैं तो फिर प्रशासन शहरों-गांव के संग शिविरों में क्या काम हो रहा है?
सीएम अशोक गहलोत को अखबारों में विज्ञापन देने के बजाए शिविरों की हकीकत का पता लगाना चाहिए।
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15 नवंबर को भी मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने भीलवाड़ा के चाँखेड में प्रशासन गांव के संग शिविर का अवलोकन किया। इससे पहले भी गहलोत ने अपने दौरों में गांव और शहरों के शिविरों का जायजा लिया है। गहलोत का प्रयास है कि सरकार की मंशा के अनुरूप इन शिविरों में लोगों को राहत मिले। लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि सीएम गहलोत अभी भी इन शिविरों की हकीकत से परिचित नहीं है। शिविर में बैठे अधिकारी और कर्मचारी सरकार के कायदे कानून रख कर अधिकांश कामों को टाल रहे हैं। अधिकारियों का कहना है कि सरकार अखबारों में कितने भी विज्ञापन दे दे लेकिन सरकार के नियमों के अनुरूप ही काम काज होगा। सब जानते हैं कि सरकार ने पहले ही योजना क्षेत्र की भूमि पर कब्जों के पट्टे जारी करने पर रोक लगा रखी है। इसी प्रकार हाईकोर्ट ने जोनल प्लान के अभाव में भूखंडों के नियमितिकरण पर रोक लगाई है। इतनी पाबंदियों के बावजूद भी इन शिविरों को आयोजित किया जा रहा है। सबसे आसान काम योजना क्षेत्र के भूखंडों के फ्री होल्ड पट्टे जारी करने का है। लेकिन अधिकारियों की अड़ंगेबाजी के कारण फ्री होल्ड पट्टे भी आसानी से नहीं मिल रहे हैं। जिन भूखंड धारकों ने संबंधित निकाय में नामांतरण करवा लिया है, उनके भी फ्री होल्ड पट्टे जारी नहीं हो रहे हैं। जो भूखंडधारी शिविर में पुराना पट्टा और नामांतरण के दस्तावेज लेकर जाता है तो उसे भी फ्री होल्ड का पट्टा देने से इंकार किया जा रहा है। अधिकारियों का कहना है कि भले ही नामांतरण हो गया हो, लेकिन फिर भी अखबार में आम सूचना प्रकाशित करवानी होगी। आम सूचना के प्रकाशन के सात दिन बाद फ्री होल्ड पट्टा देने की कार्यवाही शुरू होगी। अखबार वाले इस आम सूचना के 10 हजार रुपए तक वसूल रहे हैं। सवाल उठता है कि जब भूखंडधारी ने लीज की एकमुश्त राशि जमा करा दी है और भूखंड का नामांतरण हो गया है तब अखबार में आम सूचना प्रकाशन की शर्त क्यों लगाई जा रही है? जाहिर है कि निकायों के अधिकारी सरकार की मंशा के अनुरूप काम नहीं करना चाहते हैं। 15 दिन पहले अजमेर में नगरीय विकास विभाग के प्रमुख शासन सचिव कुंजीलाल मीणा ने कहा था कि फ्री होल्ड पट्टे के लिए अखबार में आम सूचना की जरूरत नहीं है। लेकिन मीणा के इस आदेश को कोई भी निकाय मानने को तैयार नहीं है, भले ही राज्य सरकार 500 रुपए में पट्टा दे रही हो, लेकिन अधिकारियों की अड़ंगेबाजी के कारण भूखंडधारी को तीन हजार रुपए से लेकर 10 हजार रुपए तक अखबार वालों को देने पड़ रहे हैं। इतना ही नहीं फ्री होल्ड पट्टों के लिए जितनी समस्याएं बताई जा रही है, उसे देखते हुए आम भूखंडधारी फ्री होल्ड पट्टा प्राप्त नहीं कर पा रहा है। जिन भूखंडधारियों के मूल पट्टे बैंक में गिरवी रखे हुए हैं, वो तो फ्री होल्ड पट्टा प्राप्त कर ही नहीं सकते। अधिकारियों की शर्त है कि पुराना पट्टा जमा कराने पर ही फ्री होल्ड का नया पट्टा जारी होगा। सरकार ने बैंक में रखे मूल पट्टे को लेकर कोई स्पष्ट निर्देश नहीं दिए हैं। अधिकारियों की ऐसी अडंगेबाजी हर काम में है। गंभीर बात तो यह है कि शिविरों में मौजूद अधिकारी कोई संतोषजनक जवाब भी नहीं देते हैं। हर अधिकारी का रवैया टालने वाला होता है। जब फ्री होल्ड पट्टे ही नहीं मिल रहे हैं तो फिर अन्य कामों का अंदाजा लगाया जा सकता है। शिविरों में लोगों के काम नहीं होने से भारी नाराजगी है।

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