एक विधवा महिला किसी पीड़ा की वजह से मौन सी हो जाती है और आगे न बोलने का फैसला लेती है। फिर जब उसके जीवन में बचपन के दोस्त का प्रवेश होता है तो उससे उसके घायल दिल में प्यार की लौ फिर जल उठती है। ईरानी निर्देशक सेतारेह एस्कंदरी की बलूची फिल्म द सन ऑफ दैट मून, सिने प्रेमियों के लिए एक डूब जाने वाला अनुभव है जिसमें बीबन के किरदार की कोलाहल भरी भीतरी दुनिया और वो रूढ़िवादी समाज नज़र आता है जिस समाज के लिए अपने बचपन के प्यार की चाह वर्जित है।
बलूची भाषा में ‘खुर्शीद-ए आन माह’ के नाम से मशहूर इस फिल्म का 52वें भारतीय अंतर्राष्ट्रीय फ़िल्म महोत्सव (इफ्फी) में वर्ल्ड प्रीमियर हुआ है। सिस्तान और बलूचिस्तान के दक्षिण-पूर्वी ईरानी प्रांतों पर आधारित इस फ़िल्म को इफ्फी महोत्सव के विश्व पैनोरमा खंड में सिनेमा प्रेमियों के समक्ष प्रस्तुत किया गया।
बीबन के किरदार के जरिए फ़िल्म की निर्देशक बाहरी दुनिया के लोगों को ईरान की महिलाओं के आम जीवन और यहां के लोगों की कम-ज्ञात संस्कृति को दिखाना चाहती हैं। कल 25 नवंबर, 2021 को इस महोत्सव में एक संवाददाता सम्मेलन को संबोधित करते हुए फ़िल्म की निर्देशक ने अपनी वो प्रेरणा बताई जिसने उन्हें फ़िल्म बनाने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने कहा, “मौजूदा सामाजिक-सांस्कृतिक लोकाचार और परंपरा के डर से बीबन का प्यार मौन में ही परवान चढ़ता और गिरता है।
एक विधवा होने के कारण प्रचलित सामाजिक-सांस्कृतिक मानदंडों और प्रथाओं के अनुसार, बीबन अपने बचपन के प्यार के साथ नहीं रह सकती। ये फ़िल्म बलूचिस्तान क्षेत्र की महिलाओं की सच्ची कहानी को चित्रित करती है, जो मीडिया में ठीक से नहीं दिखाई देती है। मुझे उम्मीद है कि मेरी फ़िल्म इन महिलाओं को आजादी और अधिकार दिलाएगी।”
एस्कंदरी ने प्रेम और मौन के दुखद रूप से भुला दिए गए जीवन तत्वों को याद करने की कालातीत ज़रूरत पर बात की। उन्होंने कहा, “जिस दुनिया में हम रहते हैं वह हिंसा और नफरत से भरी है। हम सब मौन और प्यार को भूल चुके हैं। मैं अपनी फ़िल्म के जरिए प्यार की ताकत का प्रदर्शन करना चाहती हूं और महिलाओं के अधिकारों और आज़ादी को प्रोजेक्ट करना चाहती हूं।”
निर्देशक ने कहा कि इस कहानी का ताल्लुक भारत से भी है, क्योंकि भारत में भी विधवा हिंदू महिलाएं कठोर जीवन शैली का पालन करती हैं। उन्होंने कहा, “मैं भारत में अपनी फ़िल्म का वर्ल्ड प्रीमियर करके बहुत खुश हूं। भारत और ईरान की जीवनशैली और संस्कृति में काफी समानताएं हैं। मुझे पूरा यकीन है कि यहां के लोग इस फ़िल्म को पसंद करेंगे।” उन्होंने याद किया कि इफ्फी में स्क्रीनिंग के दौरान उन्होंने देखा कि बहुत से लोग, विशेष रूप से महिलाएं, काफी भावुक हो गईं।
इस फ़िल्म के शीर्षक के मतलब पर बात करते हुए एस्कंदरी ने कहा: “ईरान की संस्कृति में सूरज को पुरुष और चांद को महिला के रूप में दर्शाया गया है, जो कि क्रमशः रोशनी और अंधेरे का भी प्रतिनिधित्व करते हैं। जैसा कि ये फ़िल्म एक पुरुष की तुलना में एक महिला के जीवन में मौजूद अंधेरे को दिखाती है, तो वहीं से शीर्षक आता है।”
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इफ्फी के दर्शकों को बहुत खुशी हुई जब एस्कंदरी ने कहा कि ईरान के लोग भारतीय सिनेमा को खासा पसंद करते हैं। उन्होंने बताया, “हमारे यहां ज्यादातर लोगों ने फ़िल्म शोले देखी है और वे अमिताभ बच्चन को पसंद करते हैं। लैजेंड सत्यजीत रे हमेशा मेरे लिए एक आदर्श रहे हैं और मैं उनकी फ़िल्मों से प्रेरणा लेती हूं।”
ईरान के खुरासान में जन्मी सेतारेह एस्कंदरी एक प्रतिभावान अभिनेत्री हैं जिन्हें थिएटर, टीवी और फ़िल्मों में अपने काम के लिए अत्यधिक सम्मान और प्रशंसाएं मिली हैं। ईरानी थिएटर के बड़े-बड़े अदाकारों के साथ एस्कंदरी ने काम किया है, खासकर ‘दे ट्रूप’ में अली रफ़ी के साथ और वे रंगमंच व टीवी नाटकों के निर्देशक के रूप में भी सक्रिय हैं। द सन ऑफ दैट मून उनकी पहली फीचर फ़िल्म है।
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