देश में अल्‍पसंख्‍यक ईसाई 11% लेकिन मिशनरी स्‍कूल सबसे ज्‍यादा 72% और इनमें अल्पसंख्यक बच्चों की हिस्सेदारी मात्र 37% बाकी अन्य

देश में अल्‍पसंख्‍यक ईसाई 11% लेकिन मिशनरी स्‍कूल सबसे ज्‍यादा 72% और इनमें अल्पसंख्यक बच्चों की हिस्सेदारी मात्र 37% बाकी अन्य

देश में अल्‍पसंख्‍यक ईसाई 11% लेकिन मिशनरी स्‍कूल सबसे ज्‍यादा 72% और इनमें अल्पसंख्यक बच्चों की हिस्सेदारी मात्र 37% बाकी अन्य

राष्ट्रीय शिक्षा अधिकार कानून को लेकर राष्ट्रीय बाल अधिकार व संरक्षण आयोग की ओर से किए गए देशव्‍यापी सर्वे में कई बड़े खुलासे किए गए हैं. एनसीपीसीआर ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि भारत में अल्पसंख्यक नाम से इसके तहत मिलने वाली छूट के दायरे में जितने भी स्कूल खुले हुए हैं उनमें ज्यादातर बहुसंख्यक वर्ग यानि कि गैर ईसाई समुदाय यानि नॉन क्रिश्चियन कम्‍यूनिटी के बच्चे पढ़ाई कर रहे हैं. इसलिए इन स्कूलों को आरटीई से अलग रखना सही नहीं है. इनको भी RTE के तहत किया जाए.

एनसीपीसीआर के मुताबिक देश में चल रहे कॉन्‍वेंट या मिशनरी स्कूलों के साथ ही मुस्लिम समुदाय के मदरसों को आरटीई कानून से अलग रखा गया है. इन स्‍कूलों को इसलिए खोला गया है कि इन स्‍कूलों में अल्‍पसंख्‍यक समुदाय के बच्‍चे पढ़ाई करें लेकिन आयोग के सर्वे में सामने आया है कि इन स्कूलों में अधिकांश बहुसंख्यक वर्ग के बच्चे ही पढ़ाई कर रहे हैं.

ये स्कूल अल्पसंख्यक स्कूल के नाम से काफी फायदा केंद्र द्वारा सरकार से ले रहे हैं. पूरे देश के प्रतिशत की बात करें तो एनसीपीसीआर ने पाया है कि अल्पसंख्यक स्कूलों में 62.5% छात्र गैर-अल्पसंख्यक समुदायों से हैं. एनसीपीसीआर ने अल्पसंख्यक स्कूलों का राष्ट्रव्यापी मूल्यांकन करने के बाद सरकार से मदरसों सहित ऐसे सभी स्कूलों को शिक्षा के अधिकार और सर्व शिक्षा अभियान के दायरे में लाने की सिफारिश की है.

एनसीपीसीआर ने ऐसे स्कूलों में अल्पसंख्यक समुदायों के छात्रों के लिए आरक्षण का भी समर्थन किया है. ऐसा इसलिए किया है क्योंकि इसके सर्वेक्षण में वहां पढ़ने वाले गैर-अल्पसंख्यक छात्रों का एक बड़ा हिस्सा पाया गया है. जारी एनसीपीसीआर की सर्वे रिपोर्ट के मुताबिक सिर्फ ईसाई मिशनरी स्कूलों या कॉन्‍वेंट स्‍कूलों में पढ़ने वाले छात्रों में 74% छात्र गैर-अल्पसंख्यक समुदायों के हैं. जबकि सिख, बौद्ध, पारसी और जैन आदि समुदायों को भी मिला लिया जाए तो धार्मिक अल्‍प संख्‍या के आधार पर खोले गए सभी स्कूलों में कुल मिलाकर 62.50% छात्र गैर-अल्पसंख्यक समुदायों के पढ़ रहे हैं.

रिपोर्ट में आगे बताया गया है कि देश में धार्मिक रूप से अल्‍पसंख्‍यक ईसाइयों की आबादी सिर्फ 11. 54% है जबकि स्‍कूलों के मामले में देखें तो कुल स्‍कूलों के 71.96% स्‍कूल इन्‍हीं के हैं जो कॉन्‍वेंट या ईसाई मिशनरी नाम से जाने जाते हैं. वहीं मुस्लिमों की बात करें तो देश में मुस्लिम समुदायों के स्‍कूल जिनमें मदरसे भी शामिल हैं, कुल स्‍कूलों के सिर्फ 22.75% हैं. वहीं इन स्‍कूलों में बहुसंख्‍यक वर्ग के सिर्फ 20. 29% ही बच्‍चे पढ़ते हैं जो कि बहुसंख्‍यक वर्ग का सबसे कम है. बाकी मुस्लिम समुदाय से हैं.

स्‍कूलों में पढ़ाई करने वाले बच्‍चों में जहां 62.50% बच्‍चे बहुसंख्‍यक समुदाय के हैं जबकि 37.50% बच्‍चे अल्‍पसंख्‍यक समुदाय से हैं. ऐसे में राष्ट्रीय बाल संरक्षण एवं अधिकार आयोग ने सरकार से सिफारिश की है कि शिक्षा का अधिकार और सर्व शिक्षा अभियान मदरसों सहित सभी अल्पसंख्यक स्कूलों में लागू किया जाए.

आईपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष एडवोकेट अशोक अग्रवाल और महासचिव कैलाश शर्मा ने शिक्षा अधिकार कानून को लेकर एनसीपीआरसी की सर्वेक्षण रिपोर्ट की बातों पर सहमति प्रदान करते हुए कहा है कि  ईसाई मिशनरी स्कूलों में पढ़ने वाले 74% छात्र अल्पसंख्यक समुदाय से नहीं हैं. कई स्कूल अल्पसंख्यक संस्थानों के रूप में पंजीकृत हैं, सिर्फ इसलिए कि उन्हें आरटीई लागू करने की आवश्यकता नहीं है लेकिन क्या अनुच्छेद 30, जो अल्पसंख्यकों को सांस्कृतिक भाषाई और धार्मिक संरक्षण के लिए अपने संस्थान खोलने का अधिकार सुनिश्चित करता है, अनुच्छेद 21 (ए) का उल्लंघन कर सकता है जो एक बच्चे के शिक्षा के मौलिक अधिकार की रक्षा करता है. निश्चित रूप से अनुच्छेद 21 (ए) मजबूत होना चाहिए. ऐसे में आयोग की रिपोर्ट के बाद इन स्‍कूलों को मिली छूट की समीक्षा की जानी चाहिए.

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