राजस्थान हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: दिव्यांगता परीक्षण के नाम पर उत्पीड़न गलत, कानून का दुरुपयोग न करे सरकार

राजस्थान हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: दिव्यांगता परीक्षण के नाम पर उत्पीड़न गलत, कानून का दुरुपयोग न करे सरकार

जयपुर | राजस्थान हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण आदेश में स्पष्ट किया है कि फर्जी सर्टिफिकेट की जांच के नाम पर किसी दिव्यांग व्यक्ति को बार-बार मेडिकल बोर्ड के समक्ष बुलाना गलत है। कोर्ट ने कहा कि हालांकि कानून का दुरुपयोग रोकना सरकार की जिम्मेदारी है, लेकिन इसे उत्पीड़न का जरिया नहीं बनाया जाना चाहिए।

क्या है पूरा मामला?

न्यायाधीश अशोक कुमार जैन ने याचिकाकर्ता कुलदीप चौधरी की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की। याचिकाकर्ता के अधिवक्ता मिर्जा फैस़ल बैग ने दलील दी कि:

  • याचिकाकर्ता 'लो विजन' (Low Vision) श्रेणी का दिव्यांग है।

  • मेडिकल बोर्ड उसका पुनर्मूल्यांकन कर चुका है, जिसमें उसकी दिव्यांगता 40% से अधिक पाई गई है।

  • इसके बावजूद SOG (स्पेशल ऑपरेशन ग्रुप) ने उसे दोबारा जांच के लिए पेश होने का नोटिस थमा दिया।

कोर्ट की तल्ख टिप्पणी

कोर्ट ने मामले को निस्तारित करते हुए कहा कि यदि किसी व्यक्ति की दिव्यांगता का आकलन एक बार विभागीय निर्देश पर हो चुका है, तो उसे बार-बार उसी प्रक्रिया के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने कहा, "सिविल रिट के आधार पर पुलिस जांच या शिकायत की चुनौती पर रोक लगाना संभव नहीं है, लेकिन प्रक्रिया न्यायसंगत होनी चाहिए।"


53 साल पुराना जमीन विवाद सुलझा: हाईकोर्ट ने 1972 की सनद को माना वैध, प्रशासनिक आदेश निरस्त

जोधपुर | राजस्थान हाईकोर्ट की जोधपुर पीठ ने नागौर की 150 बीघा जमीन से जुड़े आधे दशक से भी पुराने विवाद का अंत कर दिया है। कोर्ट ने वर्ष 1972 में जारी की गई सनद (मालिकाना हक का दस्तावेज) को बरकरार रखते हुए जिला कलेक्टर और संभागीय आयुक्त के पुराने आदेशों को रद्द कर दिया है।

विभाजन से जुड़ा था मामला

न्यायाधीश मुन्नुरी लक्ष्मण की एकल पीठ ने सुखराम व अन्य की याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए यह फैसला सुनाया।

  • इतिहास: नागौर स्थित करीब 149 बीघा भूमि मूल रूप से वली मोहम्मद और मोहम्मद रमजान के नाम थी, जो 1947 में पाकिस्तान चले गए थे।

  • सनद की कहानी: इस जमीन को 'इवैक्यूई प्रॉपर्टी' घोषित किया गया था। रिकॉर्ड के अनुसार, क़ालू खान इस भूमि पर काबिज थे और उन्होंने 15 जून 1972 को निर्धारित प्रक्रिया के तहत सनद प्राप्त की थी।

कोर्ट का फैसला

अधिवक्ता रमित मेहता की दलीलों को स्वीकार करते हुए कोर्ट ने पाया कि सनद जारी करने की प्रक्रिया पूरी तरह नियमों के अनुरूप थी। प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा बाद में की गई कार्यवाही का कोई पर्याप्त आधार नहीं था। कोर्ट ने सभी विपरीत आदेशों को निरस्त कर 1972 की सनद को पूर्ण रूप से मान्य घोषित कर दिया।


#RajasthanHigh Court #Justice #LegalNews #SpeciallyAbledRights #LandDispute #NagaurNews #JodhpurBench #HighCourtDecision #LawUpdate #RajasthanNews

G News Portal G News Portal
47 0

0 Comments

No comments yet. Be the first to comment!

Leave a comment

Please Login to comment.

© G News Portal. All Rights Reserved.