जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने होमगार्ड्स की ड्यूटी व्यवस्था को लेकर ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए राज्य सरकार को विस्तृत दिशा-निर्देश जारी किए हैं। कोर्ट ने मुख्य सचिव और गृह सचिव को आदेश दिया है कि तीन महीने के भीतर इसकी अनुपालना रिपोर्ट दाखिल करें।
न्यायमूर्ति फरजंद अली की एकल पीठ ने हरिशंकर आचार्य सहित अन्य याचिकाकर्ताओं की ओर से दायर याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए कहा कि राज्य सरकार को पहले से उपलब्ध प्रशिक्षित होमगार्ड्स का अधिकतम उपयोग करना चाहिए। होमगार्ड्स को पुलिस के साथ तैनात करने से यातायात नियंत्रण, जनसभा प्रबंधन, आपदा प्रतिक्रिया और कानून-व्यवस्था में सीधा लाभ होगा।
न्यूनतम कार्य दिवस : हर होमगार्ड को महीने में कम से कम 22 दिन की ड्यूटी दी जाए।
जिलेवार तैनाती : हर जिले में करीब 1000 होमगार्ड्स तैनात हों। बड़े जिलों में यह संख्या 1200-1300 और छोटे जिलों में 700-800 तक हो सकती है।
संख्या बढ़ोतरी : होमगार्ड्स की स्वीकृत संख्या बढ़ाकर 50 हजार की जाए, क्योंकि पिछली बार 1992 में ही यह बढ़ाई गई थी।
महिला प्रतिनिधित्व : होमगार्ड्स में महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए विशेष प्रयास किए जाएं।
डिजिटल और पारदर्शिता : तैनाती के लिए होमगार्ड डिप्लॉयमेंट मैनेजमेंट सिस्टम सॉफ्टवेयर लागू हो, जिसमें ड्यूटी डिमांड, उपस्थिति, भुगतान और बायोमेट्रिक इंटीग्रेशन शामिल हो।
भत्ते और सुविधाएं : होमगार्ड्स को महंगाई भत्ता (DA) दिया जाए और नियमित पे-स्लिप जारी की जाए।
भेदभाव पर रोक : वर्दीधारी और गैर-वर्दीधारी होमगार्ड्स को समान पारिश्रमिक मिले।
कार्य-विस्तार : होमगार्ड्स को पुलिस के अलावा ट्रैफिक प्रबंधन, वन विभाग, एक्साइज, स्कूल, अस्पताल और आपदा प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में भी तैनात किया जाए।
पीठ ने कहा कि उत्तर प्रदेश में निरंतर तैनाती का मॉडल सफलतापूर्वक लागू किया जा चुका है। राजस्थान सरकार को भी वहां की व्यवस्था का अध्ययन कर राज्य में लागू करना चाहिए।
राज्य में करीब 30 हजार पंजीकृत होमगार्ड्स हैं, लेकिन केवल 17 हजार की ही नियमित तैनाती हो पाती है। कोर्ट ने कहा कि “स्वयंसेवक” के नाम पर होमगार्ड्स का शोषण न्याय, समानता और बंधुत्व के आदर्शों के खिलाफ है।
हाईकोर्ट का यह फैसला न केवल होमगार्ड्स के आर्थिक और सामाजिक हितों को मजबूती देगा, बल्कि प्रदेश में कानून-व्यवस्था और आपदा प्रबंधन को भी और अधिक प्रभावी बनाएगा।
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