कोटा रेलवे में 'स्पेशल छुट्टी' का महा-खेल: बैठक के नाम पर ली लीव और पहुँच गए भोपाल, प्रशासन मौन

कोटा रेलवे में 'स्पेशल छुट्टी' का महा-खेल: बैठक के नाम पर ली लीव और पहुँच गए भोपाल, प्रशासन मौन

कोटा। कोटा रेल मंडल में 'स्पेशल छुट्टी' (Special CL) के खुलेआम दुरुपयोग के मामले थमने का नाम नहीं ले रहे हैं। रेलवे एम्प्लॉइज यूनियन के बाद अब वेस्ट सेंट्रल रेलवे मजदूर संघ के पदाधिकारियों का नया कारनामा सामने आया है। मामला 'कोटा' में बैठक के नाम पर छुट्टी लेकर 'भोपाल' में मौज मनाने का है, जिसने रेलवे की प्रशासनिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

कोटा में बैठक, भोपाल में उपस्थिति

ताजा घटनाक्रम के अनुसार, रेलवे मजदूर संघ की कोटा लोको शाखा ने 27 और 28 दिसंबर को कार्यकारिणी की बैठक के लिए 20 पदाधिकारियों की स्पेशल छुट्टी मांगी थी। रेलवे प्रशासन ने इनमें से केवल 6 पदाधिकारियों की छुट्टी मंजूर की।

  • नियमों की धज्जियाँ: ये 6 पदाधिकारी कोटा में बैठक करने के बजाय 27-28 दिसंबर को भोपाल में आयोजित संघ के वार्षिक अधिवेशन में नजर आए।

  • लापरवाही: इन पदाधिकारियों ने कोटा मुख्यालय छोड़ने के लिए प्रशासन से कोई अनुमति (HQ Leave Permission) लेना भी जरूरी नहीं समझा।

कोरम का बहाना और छुट्टी का निशाना

जानकारों का कहना है कि प्रशासन को भली-भांति पता है कि किसी भी आधिकारिक बैठक के लिए कम से कम 50% पदाधिकारियों की उपस्थिति (कोरम) अनिवार्य है। जब प्रशासन ने 20 में से केवल 6 की छुट्टी मंजूर की, तो बैठक होना तकनीकी रूप से असंभव था। इसके बावजूद चंद लोगों को छुट्टी देना सीधे तौर पर इसके दुरुपयोग को बढ़ावा देना है।

आम रेलकर्मियों पर दोहरी मार

यह खेल किसी एक संगठन तक सीमित नहीं है। सभी यूनियनें अक्सर बैठकों के नाम पर स्पेशल छुट्टी का सहारा लेती हैं। इसका सबसे बड़ा नुकसान उन आम रेल कर्मचारियों को होता है जो अपनी ड्यूटी पर तैनात रहते हैं:

  1. काम का बोझ: साथियों के छुट्टी पर होने से काम का दबाव दोगुना हो जाता है।

  2. जरूरी छुट्टियां रद्द: जब आम कर्मचारी को वास्तव में घर के जरूरी काम के लिए छुट्टी चाहिए होती है, तो 'स्टाफ की कमी' का हवाला देकर उनकी अर्जी खारिज कर दी जाती है।

प्रशासन की 'मौन' सहमति?

पिछले दिनों लखनऊ मीटिंग के नाम पर छुट्टी लेकर गंगापुर में चुनाव प्रचार और कार्यक्रमों में घूमने वाले पदाधिकारियों का मामला भी सुर्खियों में रहा था, लेकिन अब तक किसी के खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई है। रेलवे के गलियारों में चर्चा है कि प्रशासन और संगठनों की कथित 'मिलीभगत' के कारण यह ढर्रा सालों से बेखौफ चल रहा है।


मुख्य सवाल:

  • बिना मुख्यालय छोड़ने की अनुमति के कर्मचारी दूसरे शहर कैसे पहुँच गए?

  • जब बैठक का कोरम पूरा नहीं हो सकता था, तो छुट्टी क्यों मंजूर की गई?

  • क्या रेल प्रशासन इन फर्जी छुट्टियों पर कोई रिकवरी या अनुशासनात्मक कार्रवाई करेगा?


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