जयपुर: देश के विभिन्न राज्यों में खांसी की सिरप की गुणवत्ता और उसके उपयोग को लेकर उठे गंभीर सवालों के बीच, केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने सख्त रुख अपनाया है। केंद्रीय स्वास्थ्य सचिव पुण्य सलिला श्रीवास्तव ने रविवार को एक वीडियो कॉन्फ्रेंस के माध्यम से विभिन्न राज्यों के स्वास्थ्य सचिवों के साथ बैठक की और इस दौरान राजस्थान सरकार द्वारा उठाए गए कदमों की सराहना करते हुए उन्हें अन्य राज्यों में भी अपनाने के निर्देश दिए हैं।
राजस्थान के 'डोर-टू-डोर सर्वे' मॉडल की प्रशंसा
केंद्रीय स्वास्थ्य सचिव ने विशेष रूप से राजस्थान में अपनाए जा रहे निम्नलिखित उपायों का उल्लेख किया, जो बच्चों और गर्भवती महिलाओं को संभावित खतरों से बचाने के लिए महत्वपूर्ण हैं:
डोर-टू-डोर सर्वे: आशा, एएनएम और सीएचओ के माध्यम से घर-घर जाकर सर्वे करना, आमजन को विभिन्न बीमारियों से बचाव और दवाओं के सही उपयोग के लिए जागरूक करना।
दवा नियंत्रण: खांसी की दवाओं के उपयोग को नियंत्रित करना और दवाओं के नमूने लेकर उनकी गुणवत्ता की जांच करना।
टेक्निकल कमेटी: मामले की विस्तृत जांच के लिए एक तकनीकी समिति का गठन करना।
विशेषज्ञों की सलाह: विशेषज्ञ चिकित्सकों से आवश्यक सलाह प्राप्त कर बचाव के उपाय अपनाना।
चेतावनी अंकन: ऐसी दवाओं पर विशेष चेतावनी अंकित करने के राजस्थान सरकार के निर्णय को सराहा, जिनसे बच्चों और गर्भवती महिलाओं को खतरा हो सकता है।
मौसमी बीमारियों के बीच जागरूकता अभियान तेज
चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग की प्रमुख शासन सचिव गायत्री राठौड़ ने बताया कि गुणवत्ता का प्रकरण सामने आते ही विभाग ने तुरंत दवा के सभी बैचों के उपयोग और वितरण पर रोक लगा दी थी। इसके अलावा, दवाओं के उपयोग को लेकर एडवाइजरी जारी कर व्यापक जागरूकता अभियान चलाया जा रहा है।
उन्होंने बताया कि मौसमी बीमारियों को देखते हुए, सीएचओ, एएनएम और आशा के माध्यम से डोर-टू-डोर सर्वे किया जा रहा है। इस दौरान खांसी, जुकाम और बुखार के लक्षण वाले रोगियों को चिह्नित करने के साथ ही आमजन को जागरूक किया जा रहा है कि वे:
किसी भी बीमारी के मामले में घर पर रखी दवा का उपयोग नहीं करें।
नजदीकी चिकित्सा संस्थान जाकर चिकित्सक से परामर्श लें।
विशेष रूप से बच्चों एवं गर्भवती महिलाओं को बिना चिकित्सकीय सलाह के कोई दवा न दें।
घर में रखी दवाओं को बच्चों की पहुँच से दूर रखें।
राठौड़ ने आगे बताया कि तकनीकी समिति बच्चों में सामने आ रहे लक्षणों, उपचार और अन्य पहलुओं पर विस्तृत जांच और अनुसंधान कर रही है, ताकि बच्चों की मौत के वास्तविक कारणों का पता लगाया जा सके और भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोका जा सके।
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