कोटा रेल मंडल प्रशासन ने रेलवे स्टेशनों पर फर्जीवाड़ा रोकने और सुरक्षा पुख्ता करने के उद्देश्य से एक नई तकनीक को अपनाया है। मंडल के तहत आने वाले रेलवे स्टेशनों पर खानपान स्टॉल चलाने वाले और चलती-फिरती ट्रॉलियों के वेंडरों को नए डिजिटल पहचान पत्र (आईडी कार्ड) जारी किए गए हैं। हालांकि, इन नए आईडी कार्डों के 'चाइनीज तकनीक' से लैस होने की बात सामने आने के बाद अब यह नई व्यवस्था विवादों के घेरे में आ गई है।
रेलवे प्रशासन द्वारा जारी किए गए इन नए पहचान पत्रों की बनावट और कार्यप्रणाली काफी अलग है। इन कार्डों के ऊपर प्रत्यक्ष रूप से (सामने से देखने पर) वेंडर से संबंधित कोई भी निजी या स्पष्ट जानकारी नजर नहीं आती है। इसके बजाय कार्ड पर एक विशेष बारकोड दिया गया है। जब रेलवे के चेकिंग स्टाफ या सुरक्षाकर्मी इस बारकोड को मोबाइल से स्कैन करते हैं, तो वेंडर की फोटो समेत उसके नाम, पते और लाइसेंस की पूरी डिजिटल जानकारी स्क्रीन पर आ जाती है।
रेलवे प्रशासन का मानना है कि इस डिजिटल व्यवस्था से स्टेशनों पर चल रहे अवैध वेंडिंग के खेल को पूरी तरह खत्म किया जा सकेगा।
नकली आईडी पर लगाम: पहले कोई भी साधारण कार्ड प्रिंट कराकर नकली वेंडर बन जाता था, लेकिन बारकोड प्रणाली होने के कारण अब वेंडर नकली पहचान पत्र नहीं बना सकेंगे।
पारदर्शिता और सुरक्षा: रेलवे का दावा है कि इस पहल से केवल अधिकृत (लाइसेंस धारी) लोग ही स्टॉल और ट्रॉली संचालित कर पाएंगे, जिससे यात्रियों की सुरक्षा और खाद्य गुणवत्ता सुधरेगी।
फर्जीवाड़ा रोकने और सुरक्षा के कड़े इंतजाम करने की रेलवे की इस मंशा को आम लोगों और यात्रियों ने खूब सराहा है, लेकिन इसके लिए इस्तेमाल की जा रही 'चाइनीज आईडी कार्ड' तकनीक ने लोगों को हैरान कर दिया है।
नीति और नीयत पर सवाल: स्थानीय नागरिकों और जागरूक यात्रियों का कहना है कि एक तरफ देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आत्मनिर्भर भारत और 'लोकल फॉर वोकल' (Local for Vocal) का नारा बुलंद कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ भारतीय रेलवे जैसा बड़ा सरकारी उपक्रम स्वदेशी वेंडरों को ही विदेशियों (चाइनीज) द्वारा निर्मित तकनीक और कार्ड थमा रहा है। लोगों का आरोप है कि इस तरह के फैसलों से अप्रत्यक्ष रूप से विदेशी कंपनियों को फायदा पहुंचाया जा रहा है, जो कि देश की नीतियों के बिल्कुल विपरीत है।
अब जनता के बीच यह चर्चा का विषय बना हुआ है कि क्या भारतीय रेलवे को इन जरूरी सुरक्षा उपायों के लिए कोई स्वदेशी और सुरक्षित डिजिटल विकल्प नहीं मिल सका, जो उसे पड़ोसी देश की तकनीक का सहारा लेना पड़ा?
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