कोटा। रेलवे बोर्ड द्वारा सुरक्षा मानकों में किए गए बदलावों के बाद कोटा मंडल में मेमू (MEMU) ट्रेनों के संचालन को लेकर एक बड़ा संकट खड़ा हो गया है। हाल ही में आयोजित मेमू एप्टीट्यूड (मनोवैज्ञानिक) परीक्षा के परिणामों ने रेल प्रशासन की चिंता बढ़ा दी है, क्योंकि मंडल के अधिकांश लोको पायलट इस विशेष योग्यता परीक्षा में सफल नहीं हो पाए हैं।
कोटा मंडल में 9 से 12 फरवरी तक लोको पायलट्स के मनोवैज्ञानिक स्तर की जांच के लिए विशेष परीक्षा आयोजित की गई थी। इसके परिणाम चौंकाने वाले रहे:
कुल प्रतिभागी: 60 लोको पायलट।
सफल उम्मीदवार: मात्र 18 लोको पायलट ही मेमू ट्रेन चलाने के योग्य पाए गए।
परिणाम: शेष लोको पायलट इस मनोवैज्ञानिक कसौटी पर खरे नहीं उतर सके।
यह स्थिति केवल कोटा तक सीमित नहीं है; इससे पहले जबलपुर में हुई परीक्षा में भी 54 में से केवल 9 लोको पायलट ही पास हो सके थे।
पिछले वर्ष बिलासपुर में हुई ट्रेन दुर्घटना के बाद रेलवे बोर्ड ने सुरक्षा व्यवस्था को पुख्ता करने के लिए कड़ा फैसला लिया था। बोर्ड के आदेशानुसार, अब केवल वही लोको पायलट मेमू ट्रेन चला सकेंगे जिन्होंने 'साइकोलॉजिकल टेस्ट' (मनोवैज्ञानिक परीक्षा) पास की हो। इससे पहले सभी लोको पायलट सामान्य रूप से मेमू ट्रेनों का संचालन कर रहे थे।
योग्य पायलट्स की कमी के कारण कोटा मंडल को भारी व्यावहारिक दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है।
इंजन लगाकर संचालन: संकट से निपटने के लिए रेलवे ने कुछ समय तक मेमू ट्रेन में अलग से इंजन लगवाकर चलवाया था।
आगरा मंडल की आपत्ति: इस व्यवस्था में तकनीकी दिक्कतें आईं और आगरा मंडल द्वारा आपत्ति दर्ज कराने के बाद रेलवे को यह अस्थायी व्यवस्था बंद करनी पड़ी।
मेमू ट्रेनों की गति और उनकी संचालन प्रणाली सामान्य ट्रेनों से थोड़ी अलग होती है, जिसके लिए त्वरित निर्णय लेने की क्षमता और मानसिक सतर्कता की आवश्यकता होती है। अब जबकि अधिकांश पायलट फेल हो रहे हैं, रेलवे के सामने मेमू ट्रेनों के सुचारू संचालन को बनाए रखना एक बड़ी चुनौती बन गया है।
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