निरीक्षण के नाम पर 'सैर-सपाटा': कोटा में चंबल रिवर फ्रंट और सवाई माधोपुर में टाइगर रिजर्व घूमे मुख्यालय के बड़े अधिकारी, आम जनता ने उठाए सवाल

निरीक्षण के नाम पर 'सैर-सपाटा': कोटा में चंबल रिवर फ्रंट और सवाई माधोपुर में टाइगर रिजर्व घूमे मुख्यालय के बड़े अधिकारी, आम जनता ने उठाए सवाल

कोटा। भारतीय रेलवे में अधिकारियों द्वारा निरीक्षण (Inspection) के नाम पर सरकारी खर्च पर सैर-सपाटा करने का खेल थमने का नाम नहीं ले रहा है। ताजा मामला जबलपुर मुख्यालय के परिचालन विभाग (Operating Department) के एक उच्च अधिकारी से जुड़ा है, जो सोमवार को सवाई माधोपुर में रणथंभौर टाइगर रिजर्व और कोटा में चंबल रिवर फ्रंट की खूबसूरती निहारते नजर आए। मनोरंजन और घूमने-फिरने का यह दौर खत्म होने के बाद अधिकारी महोदय वापस लौट गए, जिससे एक बार फिर रेलवे के 'निरीक्षण तंत्र' पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।

दयोदय से सवाई माधोपुर और जयपुर सुपर से पहुंचे कोटा

प्राप्त जानकारी के अनुसार, मुख्यालय के यह शीर्ष अधिकारी रविवार को दयोदय एक्सप्रेस से सीधे सवाई माधोपुर पहुंचे थे। वहां संभाग के सबसे प्रसिद्ध टाइगर रिजर्व में घूमने के बाद, वे अगले दिन यानी सोमवार को 'जयपुर सुपर' ट्रेन से कोटा मंडल मुख्यालय आए। कोटा स्टेशन पर उतरने के बाद वे किसी रेल व्यवस्था, ट्रैक या सुरक्षा का जायजा लेने के बजाय सीधे शहर का प्रसिद्ध 'चंबल रिवर फ्रंट' देखने निकल गए।

करोड़ों का चूना: दिल्ली बोर्ड से लेकर मुख्यालय तक के अधिकारियों का पसंदीदा 'टूरिस्ट स्पॉट'

रेलवे से जुड़े सूत्रों और जागरूक नागरिकों का कहना है कि यह कोई पहला अवसर नहीं है जब कोई बड़े अधिकारी निरीक्षण के नाम पर कोटा मंडल में केवल मौज-मस्ती और पर्यटन करने आए हों।

  • दर्जनों अधिकारियों का तांता: इससे पहले भी न केवल जबलपुर मुख्यालय बल्कि दिल्ली रेलवे बोर्ड और देशभर के दर्जनों आला अधिकारी 'विंडो ट्रेल' और निरीक्षण का बहाना बनाकर कोटा और सवाई माधोपुर घूमने आते रहे हैं।

  • राजस्व को भारी चपत: सरकारी भत्तों, विशेष व्यवस्थाओं और निरीक्षण सैलून (सैलून कार) के नाम पर होने वाले इन दौरों से ये अधिकारी हर साल रेलवे के राजस्व को करोड़ों रुपए का चूना लगाते हैं।

दोहरे मापदंड: अधिकारियों को छूट, कर्मचारियों पर तुरंत गाज!

रेलवे की इस व्यवस्था पर आम कर्मचारियों और लोगों में भारी आक्रोश है। नाम न छापने की शर्त पर लोगों ने रेलवे के दोहरे मापदंडों (Double Standards) पर तंज कसते हुए कहा:

"नियमों का विरोधाभास:" एक तरफ जहां बड़े अधिकारी निरीक्षण के नाम पर सरकारी पैसे का दुरुपयोग कर पर्यटन का आनंद लेते हैं और उन पर कोई कार्रवाई नहीं होती, वहीं दूसरी तरफ यदि कोई छोटा रेल कर्मचारी अनजाने में भी रेलवे को जरा सा नुकसान पहुंचा देता है, तो प्रशासन उसे सीधा नौकरी से बाहर (Terminate) करने का फरमान सुना देता है।

अधिकारियों के इन 'शाही दौरों' और वीआईपी संस्कृति पर जब तक रेलवे बोर्ड कोई कड़ा एक्शन नहीं लेता, तब तक जनता के टैक्स के पैसे से चलने वाली सफारी और रिवर फ्रंट की यह सैर इसी तरह जारी रहेगी।

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