'कचरा' घोटाला: हेल्पर घर पर बना रहे खाना, ड्राइवर चला रहे टिपर; निगम को लाखों का चूना

'कचरा' घोटाला: हेल्पर घर पर बना रहे खाना, ड्राइवर चला रहे टिपर; निगम को लाखों का चूना

कोटा, 22 जुलाई 2025: कोटा उत्तर नगर निगम के अंतर्गत शहर के कई वार्डों में घर-घर कचरा संग्रहण के लिए लगे टिपर वाहनों में बड़े पैमाने पर अनियमितताएं सामने आई हैं। आरोप है कि कई टिपर बिना हेल्पर के ही चल रहे हैं, जबकि ठेकेदार के बिलों में हेल्परों के भुगतान को दर्शाते हुए लाखों रुपये का चूना निगम को लगाया जा रहा है। हैरान करने वाली बात यह है कि निगम के अधिकारी इस मामले की जानकारी से ही इनकार कर रहे हैं।

मामला तब सामने आया जब निरीक्षण में पाया गया कि कुछ टिपर केवल ड्राइवरों द्वारा चलाए जा रहे हैं, जबकि उनके साथ कोई हेल्पर मौजूद नहीं है। पूछताछ में एक टिपर चालक ने तो यहां तक कह दिया कि "हेल्पर घर पर खाना बना रही है।"

ठेके की शर्तों का उल्लंघन यह गौरतलब है कि उत्तर नगर निगम ने पिछले साल जुलाई में कोटा, गुमानपुरा की सुखपाल सिंह कंस्ट्रक्शन जेवी टीम वन को शहर के 70 वार्डों से कचरा संग्रहण का तीन साल के लिए लगभग 53 करोड़ रुपये का ठेका दिया था। इस ठेके की शर्तों के अनुसार, प्रत्येक टिपर के साथ एक ड्राइवर और एक हेल्पर का होना अनिवार्य है। लेकिन, जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है। बिलों में प्रत्येक हेल्पर को 8,000 रुपये प्रति माह का भुगतान दर्शाया जा रहा है, जिससे सीधे तौर पर निगम को वित्तीय हानि हो रही है।

वार्ड 21 में सामने आया खेल वार्ड नंबर 21 के भदाना और सरस्वती कॉलोनियों में चल रहे तीन टिपरों में से एक में भी हेल्पर नहीं मिला। यदि तीन हेल्परों का 8,000 रुपये प्रति माह के हिसाब से भुगतान हो रहा है, तो अकेले इस वार्ड से निगम को प्रति माह 24,000 रुपये का और साल भर में 2 लाख 88 हजार रुपये का चूना लग चुका है। इससे अन्य वार्डों में होने वाले संभावित नुकसान का अंदाजा लगाया जा सकता है।

नियमित संग्रहण का भी अभाव, जीपीएस भी गायब शिकायतें केवल हेल्परों के अभाव तक सीमित नहीं हैं। वार्ड की कई कॉलोनियों में टिपर नियमित रूप से नहीं पहुंच रहे हैं। स्वर्ण विहार कॉलोनी के निवासियों ने बताया कि उनके यहां करीब एक महीने से टिपर नहीं आया है, जिससे सड़कों पर जगह-जगह कचरे के ढेर लग गए हैं और गंदगी फैल रही है।

इसके अलावा, ठेका शर्तों के विपरीत, उत्तर निगम में चल रहे कई टिपरों में एक साल बाद भी आरएफआईडी टैगिंग (Radio-frequency identification) और जीपीएस (Global Positioning System) रूटिंग सिस्टम नहीं लगाया गया है। इसके चलते टिपरों की ऑनलाइन पहचान मुश्किल हो रही है और उनके आने-जाने पर भी कोई निगरानी नहीं रखी जा पा रही है। ठेकेदार को 70 वार्डों में कुल 38 टिपर और वार्ड 53, 56 और 69 में 35 टिपर और 3 अतिरिक्त ट्रॉली लगानी हैं।

पार्षद ने जांच की मांग की वार्ड 21 के पार्षद संदीप नायक ने इस पूरे मामले को "बड़ा गड़बड़ घोटाला" करार दिया है। उन्होंने कहा कि बिना हेल्पर के टिपर चल रहे हैं और उनका भुगतान हो रहा है, जिससे नगर निगम को लाखों का नुकसान हो रहा है। उन्होंने नियमित रूप से टिपर न पहुंचने और जीपीएस व आरएफआईडी टैगिंग न होने के बावजूद भुगतान होने पर भी सवाल उठाए। संदीप नायक ने जिला प्रशासन से इस पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच की मांग की है।

आयुक्त का बयान जब इस मामले पर नगर निगम उत्तर के आयुक्त अशोक त्यागी से बात की गई, तो उन्होंने कहा, "टिपर संचालन में गड़बड़ी की शिकायत नहीं मिली है। इस मामले को दिखवाया जाएगा।"

यह घटना नगर निगम के अंदर व्याप्त भ्रष्टाचार और ढुलमुल रवैये को उजागर करती है, जिस पर तत्काल लगाम कसना आवश्यक है ताकि जनता के पैसे का सही उपयोग हो सके और शहर की सफाई व्यवस्था दुरुस्त हो सके।

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