जयपुर: राजस्थान हाईकोर्ट ने वर्ष 2021 की पुलिस उपनिरीक्षक (SI) भर्ती परीक्षा की शुचिता और प्रबंधन पर बेहद तीखी टिप्पणी की है। रविवार को प्रदेश में एक बार फिर एसआई पदों के लिए आयोजित परीक्षा से ठीक एक दिन पहले आए हाईकोर्ट के इस फैसले ने पुरानी परीक्षा की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। अदालत ने स्पष्ट कहा कि परीक्षा का आयोजन पूरी तरह विफल रहा और 'दागी' व 'बेदाग' उम्मीदवारों को अलग करना अब मुमकिन नहीं है।
कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश संजीव प्रकाश शर्मा और न्यायाधीश संगीता शर्मा की खंडपीठ ने एसओजी (SOG) की जांच का हवाला देते हुए निम्नलिखित कमियां गिनाईं:
धुंधले प्रवेश पत्र: आरपीएससी (RPSC) द्वारा जारी प्रवेश पत्रों पर उम्मीदवारों की तस्वीरें स्पष्ट नहीं थीं। कोर्ट ने सवाल उठाया कि ऐसी स्थिति में 'डमी अभ्यर्थियों' को पकड़ने का कोई पुख्ता सिस्टम मौजूद नहीं था।
तकनीकी विफलता: परीक्षा केंद्रों पर न तो इंटरनेट बंद किया गया, न बायोमेट्रिक वेरिफिकेशन की व्यवस्था थी और न ही जैमर लगाए गए थे।
वीडियोग्राफी का अभाव: केंद्रों पर प्रभावी वीडियोग्राफी नहीं हुई और जो हुई उसका रिकॉर्ड तक एसओजी को उपलब्ध नहीं कराया गया।
संगठित गिरोह का जाल: पेपर लीक के पीछे 'कालेर गैंग' और 'जगदीश गैंग' जैसे संगठित नेटवर्क का हाथ था। बीकानेर के 'मैट्रिक्स कोचिंग' और जयपुर के 'रवींद्र बाल भारती स्कूल' से पेपर लीक होकर सोशल मीडिया के जरिए बड़े पैमाने पर सर्कुलेट हुआ।
अदालत ने चिंता जताते हुए कहा कि सोशल मीडिया पर पेपर लीक होने के बाद इसके 'सफर' का पता लगाना नामुमकिन है। फैसले के कुछ प्रमुख बिंदु:
सोशल मीडिया का प्रभाव: एक बार पेपर डिजिटल प्लेटफॉर्म पर आने के बाद यह अनगिनत लोगों तक पहुँच जाता है।
पहचान की मुश्किल: जो उम्मीदवार पकड़ में आए हैं, वे केवल 'टिप ऑफ द आइसबर्ग' (बड़े हिस्से का छोटा सा अंश) हो सकते हैं। दागी उम्मीदवारों की वास्तविक संख्या बहुत अधिक होने की संभावना है।
जांच रिपोर्ट में विरोधाभास: कोर्ट ने नोट किया कि एसओजी ने अपनी पहली रिपोर्ट में दागियों को अलग करना असंभव बताया था, जबकि दूसरी रिपोर्ट में इसकी संभावना जताई, लेकिन जमीनी हकीकत में दोनों के नतीजे एक जैसे ही थे।
भर्ती परीक्षाओं में बढ़ती धांधली को देखते हुए राजस्थान में कानून को बेहद कड़ा कर दिया गया है:
2021: उस समय नकल और पेपर लीक के लिए अधिकतम 3 साल की सजा थी।
2022: सजा बढ़ाकर 10 साल और 10 लाख जुर्माना किया गया।
वर्तमान (2023 से लागू): अब पेपर लीक के दोषियों को आजीवन कारावास (उम्रकैद) और 10 करोड़ रुपए तक के जुर्माने का प्रावधान है। साथ ही दोषियों की संपत्ति कुर्क करने का अधिकार भी सरकार के पास है।
हाईकोर्ट ने साफ कर दिया है कि जब पूरी परीक्षा प्रणाली ही दूषित हो जाए, तो उसे रद्द करना कानूनी रूप से आवश्यक हो जाता है। अदालत के इस कड़े रुख ने भविष्य की परीक्षाओं के लिए भी एक नजीर पेश की है कि बिना सुरक्षा और तकनीक के निष्पक्ष परीक्षा संभव नहीं है।
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