राजस्थान में ₹30,000 करोड़ से अधिक का निवेश अधर में: बिजली स्टोरेज के 7 बड़े प्रोजेक्ट्स पर लगा 'ब्रेक'

राजस्थान में ₹30,000 करोड़ से अधिक का निवेश अधर में: बिजली स्टोरेज के 7 बड़े प्रोजेक्ट्स पर लगा 'ब्रेक'

जयपुर | राजस्थान को अक्षय ऊर्जा का हब बनाने के सरकार के सपने को बड़ा झटका लगा है। अडानी, अवाडा, एनएचपीसी (NHPC) और एसजेवीएन (SJVN) जैसी दिग्गज कंपनियों के हजारों करोड़ के निवेश वाले 7 प्रोजेक्ट्स जमीन पर उतरने से पहले ही अटक गए हैं। इन परियोजनाओं का मुख्य उद्देश्य सौर और पवन ऊर्जा का भंडारण करना था, ताकि रात के समय या पीक डिमांड के दौरान निर्बाध बिजली आपूर्ति की जा सके।

प्रमुख प्रोजेक्ट्स और उनके अटकने के कारण

इन परियोजनाओं के रास्ते में सबसे बड़ी बाधा पानी की उपलब्धता और वन विभाग की आपत्तियां बनी हैं:

कंपनी का नाम प्रोजेक्ट लोकेशन क्षमता अटकने का मुख्य कारण
अदानी सौर ऊर्जा पीपलूं (बालोतरा) 1800 MW लूणी नदी में पानी की भारी कमी।
अवाडा एक्वा पिंडवाड़ा (सिरोही) 1560 MW प्रोजेक्ट क्षेत्र कुम्भलगढ़ टाइगर रिजर्व में शामिल।
सेमलिया एनर्जी बेगूं (चित्तौड़गढ़) 1200 MW मेनाली और ब्राह्मणी नदी से पानी लेने की अनुमति नहीं मिली।
THDC चांगला (उदयपुर) 1050 MW मानसी वाकल बांध का पानी केवल पीने के लिए आरक्षित।
NHPC पाहरकलां (सिरोही) 1000 MW कुम्भलगढ़ टाइगर रिजर्व और वन विभाग की आपत्तियां।
THDC बिसनपुरा (बूंदी) 800 MW तकनीकी रूप से साइट उपयुक्त नहीं पाई गई।
SJVN घाघरी (प्रतापगढ़) 580 MW सीतामाता वाइल्डलाइफ सेंचुरी का इको-सेंसिटिव जोन।

अर्थव्यवस्था और बिजली आपूर्ति पर क्या होगा असर?

इन प्रोजेक्ट्स के अटकने से राजस्थान के ऊर्जा क्षेत्र को चार बड़े नुकसान हो सकते हैं:

  1. इन्वेस्टमेंट रिस्क: हजारों करोड़ का निवेश राज्य से बाहर जाने का खतरा।

  2. बिजली संकट: गर्मी और पीक ऑवर्स (रात के समय) में बिजली आपूर्ति मैनेज करना मुश्किल होगा।

  3. ग्रीन एनर्जी को झटका: सौर ऊर्जा का उत्पादन तो बढ़ रहा है, लेकिन स्टोरेज के बिना इसका पूर्ण उपयोग संभव नहीं है।

  4. ग्रिड स्थिरता: नवीकरणीय ऊर्जा के उतार-चढ़ाव को संतुलित करने में समस्या आएगी।

अधिकारियों का पक्ष

राजस्थान अक्षय ऊर्जा निगम के एमडी रोहित गुप्ता के अनुसार, कंपनियां खुद लोकेशन का चुनाव करती हैं। कई बार शुरुआती सर्वे के बाद फिजिबिलिटी (व्यावहारिकता) की समस्या आती है। निगम निवेशकों के साथ मिलकर वैकल्पिक स्थानों की तलाश कर रहा है ताकि समाधान निकाला जा सके।

निष्कर्ष: यदि सरकार ने समय रहते इन परियोजनाओं के लिए 'सिंगल विंडो' क्लीयरेंस और जल आवंटन की नीति स्पष्ट नहीं की, तो राजस्थान में निवेश की राह और भी कठिन हो सकती है।


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