कोटा। पश्चिम मध्य रेलवे के कोटा मंडल में 'नियमों की दुहाई' देने वाला कार्मिक विभाग खुद के आदेशों को लागू करवाने में बौना साबित हो रहा है। डीआरएम ऑफिस के कार्मिक विभाग में इन दिनों "दीये तले अंधेरा" वाली कहावत चरितार्थ हो रही है, जहाँ स्थानांतरण (Transfer) आदेश जारी होने के एक महीने बाद भी न तो कर्मचारी अपनी सीट छोड़ रहे हैं और न ही वरिष्ठ अधिकारी।
हैरानी की बात यह है कि 18 फरवरी को जारी किए गए आवधिक स्थानांतरण आदेशों की पालना अभी तक नहीं हो सकी है। राजभाषा अनुभाग, जिसे बेहद संवेदनशील माना जाता है, वहां कार्यरत एक मुख्य कार्यालय अधीक्षक का तबादला कार्मिक वाणिज्य अनुभाग में किया गया था। एक महीना बीत जाने के बाद भी वे अपनी पुरानी सीट पर जमे हुए हैं।
बता दें कि राजभाषा अनुभाग में कैश इंप्रेस्ट, नकद पुरस्कार वितरण और निविदा प्रक्रियाओं जैसे महत्वपूर्ण वित्तीय कार्य होते हैं, ऐसे में आदेशों की अनदेखी प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवालिया निशान लगा रही है।
यूनियन सेल और को-ऑर्डिनेशन सेल का हाल भी कुछ अलग नहीं है। यूनियन सेल में वित्तीय और ट्रेड यूनियन संबंधी बैठकों का जिम्मा संभालने वाले एक कर्मचारी का पदोन्नति के बाद भी तबादला नहीं किया गया। वहीं, को-ऑर्डिनेशन सेल में भी लंबे समय से जमे कार्यालय अधीक्षक को पदोन्नति का लाभ उसी अनुभाग में दे दिया गया, जो नियमों की अवहेलना की ओर इशारा करता है।
[Image: Kota DRM Office Building]
सिर्फ कर्मचारी ही नहीं, रसूखदार अधिकारी भी आदेशों को ठेंगा दिखा रहे हैं:
सीनियर डीएमई (Sr. DME): इनका तबादला एक महीने पहले हुआ था, लेकिन पदभार अभी भी नहीं छोड़ा है।
टीआरडी और टीआरओ (TRD & TRO): मंडल इंजीनियर स्तर के इन दो अधिकारियों का आपस में ट्रांसफर हुआ था, लेकिन डेढ़ महीने बाद भी दोनों ने एक-दूसरे का पद नहीं संभाला है।
पूर्व उदाहरण: चर्चा है कि इससे पहले वरिष्ठ मंडल कार्मिक अधिकारी सुप्रकाश ने भी स्थानांतरण के बाद एक महीने तक अपनी कुर्सी नहीं छोड़ी थी।
आम रेल कर्मचारियों को छोटी-छोटी बातों पर ट्रांसफर की चेतावनी देने वाला कोटा रेल प्रशासन इन रसूखदारों के आगे बेबस नजर आ रहा है। सेवानिवृत्त होने के बाद भी कई कर्मचारियों का दोबारा उन्हीं संवेदनशील पदों पर काबिज होना विभाग की पारदर्शिता पर गहरा धक्का है। आखिर क्या वजह है कि नए अधिकारियों का भी यहां कोई प्रभाव नजर नहीं आ रहा है?
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