राजस्थान विधानसभा का बजट सत्र चल रहा है, लेकिन पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और वसुंधरा राजे की अनुपस्थिति अब चर्चा का विषय बन गई है। अब तक दोनों नेता सदन की कार्यवाही में एक दिन भी शामिल नहीं हुए हैं। यह स्थिति न केवल विपक्ष बल्कि सत्ता पक्ष के सदस्यों के बीच भी फुसफुसाहट का कारण बन रही है।
विपक्ष के गतिरोध के दौरान अशोक गहलोत ने विधानसभा के बाहर धरने में भाग लिया, लेकिन सदन के भीतर नहीं गए। इससे कई विधायकों में यह सवाल उठने लगा कि यदि वरिष्ठ नेता शुरू में ही गतिरोध सुलझाने की प्रक्रिया में शामिल होते तो मामला जल्द सुलझ सकता था।
पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने भी पिछले दिनों विधानसभा अध्यक्ष से मुलाकात की लेकिन सदन की कार्यवाही में हिस्सा नहीं लिया। सदन में उनके न आने से भाजपा के नए विधायकों को प्रेरणा नहीं मिल रही, जो पहले अनुभवी नेताओं की उपस्थिति से बहस में धार लाने की उम्मीद रखते थे।
इस बार विधानसभा में पहली बार निर्वाचित विधायकों की संख्या 83 है, जो कुल सदन का 41.5% हिस्सा है। ऐसे में अनुभवी नेताओं की गैरमौजूदगी नए विधायकों के लिए सीखने की प्रक्रिया को प्रभावित कर रही है।
विधानसभा अध्यक्ष वासुदेव देवनानी ने सदन की कार्यवाही को सुचारू रूप से संचालित करने के लिए बार-बार निर्देश दिए हैं, लेकिन कई मंत्री और विधायक कार्यवाही के दौरान सीट छोड़कर बाहर चले जाते हैं। इससे सदन की गरिमा भी प्रभावित हो रही है।
पहली बार सदन में पहुंचे विधायकों ने सदन की कार्यवाही और नियमों की जानकारी के लिए प्रशिक्षण की मांग की है। अध्यक्ष से इस संबंध में कुछ विधायकों ने अनुरोध भी किया है।
वरिष्ठ नेताओं की सदन में अनुपस्थिति ने सदन की कार्यवाही की गुणवत्ता पर असर डाला है। अनुभवी नेताओं की मौजूदगी से न केवल फ्लोर मैनेजमेंट बेहतर होता है, बल्कि नए विधायकों को प्रेरणा भी मिलती है। सदन के बेहतर संचालन के लिए अनुभवी नेताओं की सक्रिय भागीदारी जरूरी है।
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