झालावाड़ / जयपुर।
राजस्थान की सड़कों पर सफर करना दिन-ब-दिन खतरनाक होता जा रहा है। भले ही प्रशासनिक स्तर पर सड़क सुरक्षा के तमाम दावे किए जा रहे हों, लेकिन धरातल पर जो आंकड़े सामने आए हैं, वे बेहद खौफनाक और डराने वाले हैं। केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय के इंटीग्रेटेड रोड एक्सीडेंट डेटाबेस (आईरेड - iRAD) द्वारा वर्ष 2026 के शुरुआती छह महीनों (जनवरी से जून) के जारी आंकड़े बताते हैं कि राजस्थान की सड़कों पर हर 44 मिनट में एक व्यक्ति की जान जा रही है और रोजाना औसतन 33 लोग अकाल मौत का शिकार हो रहे हैं।
ज्यादातर जानलेवा हादसे राजधानी जयपुर सहित बड़े शहरों, एक्सप्रेस-वे, नेशनल हाईवे (NH) और स्टेट हाईवे (SH) पर दर्ज किए गए हैं।
मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार, जनवरी से जून 2026 के बीच पूरे प्रदेश के भीतर कुल 12,616 सड़क दुर्घटनाएं हुईं। इन हादसों ने कई हंसते-खेलते परिवारों को उजाड़ दिया, जिसमें 6,020 लोगों की मौके पर या इलाज के दौरान मौत हो गई, जबकि 13,141 लोग गंभीर रूप से घायल या हमेशा के लिए अपाहिज हो गए।
यदि पिछले वर्ष (2025) की समान अवधि से तुलना की जाए, तो इस साल आंकड़ों में मामूली गिरावट जरूर दर्ज की गई है, जो इस प्रकार है:
| समयावधि (जनवरी - जून) | कुल सड़क हादसे | कुल मौतें | कुल घायल |
| वर्ष 2025 | 13,966 | 6,444 | 13,328 |
| वर्ष 2026 | 12,616 | 6,020 | 13,141 |
| प्रतिशत कमी (-) | 9.67% | 6.58% | 1.40% |
हालांकि मौतों में करीब 6.58% की कमी आई है, लेकिन हर दिन 33 लोगों का अपनी जान गंवाना यह साबित करता है कि राजस्थान की सड़कें अभी भी सुरक्षित गलियारा नहीं बन पाई हैं।
आंकड़ों के विश्लेषण से साफ है कि सबसे अधिक सड़क दुर्घटनाएं भारी ट्रैफिक दबाव वाले जिलों और बड़े औद्योगिक व शहरी सेंटर्स में हो रही हैं। पुलिस कमिश्नरेट का जयपुर पश्चिम (Jaipur West) जिला 846 हादसों के साथ पूरे प्रदेश में अव्वल नंबर पर है।
जयपुर पश्चिम: 846 हादसे
जयपुर पूर्व: 749 हादसे
उदयपुर: 581 हादसे
जयपुर दक्षिण: 535 हादसे
सीकर: 482 हादसे
इसके विपरीत कम आबादी, नए जिलों या भौगोलिक स्थिति के कारण मरुस्थलीय इलाकों में हादसे कम दर्ज हुए हैं:
जैसलमेर: 65 हादसे
खैरथल-तिजारा: 87 हादसे
फलौदी: 91 हादसे
भिवाड़ी: 96 हादसे
सलूम्बर: 99 हादसे
बारां जिले को राहत: अच्छी खबर बारां जिले से आई है, जहाँ पिछले साल के मुकाबले सड़क हादसों का ग्राफ 210 से घटकर 182 रह गया और मौतों का आंकड़ा भी 115 से घटकर 91 पर आ गया है।
यहाँ बढ़ा ग्राफ: इसके उलट झालावाड़, कोटा शहर, भीलवाड़ा और पाली जैसे जिलों में इस छह माही के भीतर सड़क दुर्घटनाओं और मरने वालों की संख्या में अचानक बढ़ोतरी दर्ज की गई है, जो स्थानीय पुलिस और प्रशासन के लिए चिंता का विषय है।
सड़क सुरक्षा विशेषज्ञों और हाईवे अथॉरिटी के अधिकारियों का मानना है कि जब तक बुनियादी कमियों को दूर नहीं किया जाएगा, तब तक मौतों के आंकड़ों में बड़ी कमी लाना असंभव है। इसके लिए निम्नलिखित कदम उठाने बेहद जरूरी हैं:
ब्लैक स्पॉट (Black Spots) में सुधार: हाईवे और टर्निंग पॉइंट्स पर जिन जगहों पर बार-बार हादसे होते हैं, उन इंजीनियरिंग डिफेक्ट्स को तुरंत ठीक किया जाए।
तेज रफ्तार पर लगाम: एक्सप्रेस-वे और नेशनल हाईवे पर ओवरस्पीडिंग (तेज गति) को रोकने के लिए आधुनिक इंटरसेप्टर और स्पीड रडार कैमरे लगाए जाएं।
सख्त नियम पालना: दुपहिया वाहन चालकों के लिए हेलमेट और कार चालकों के लिए सीट बेल्ट के नियमों का बिना किसी रसूख के सख्ती से पालन कराया जाए।
गोल्डन ऑवर चिकित्सा: हादसे के ठीक बाद (पहले एक घंटे के भीतर) घायल को तत्काल 'ट्रॉमा केयर' या प्राथमिक चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराने के लिए हाईवे पर 108 एम्बुलेंस का रिस्पॉन्स टाइम सुधारा जाए।
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