कोटा। कोटा रेल मंडल पहले से ही रनिंग स्टाफ की भारी कमी से जूझ रहा है, लेकिन प्रशासनिक मिस मैनेजमेंट के कारण यह संकट और भी गहराता जा रहा है। एक ट्रेन को दो के बजाय तीन-तीन क्रू चला रहे हैं, जिससे न केवल स्टाफ की कमी बढ़ रही है, बल्कि रेलवे को अनावश्यक आर्थिक नुकसान भी हो रहा है।
इसका सबसे ताजा उदाहरण आगरा-असरवा स्पेशल ट्रेन (09019-20) है। इस ट्रेन को आगरा के गार्ड और ड्राइवर गंगापुर तक लाते हैं। फिर गंगापुर के क्रू इसे केशवरायपाटन तक ले जाते हैं, और वहाँ से कोटा के गार्ड-ड्राइवर इस ट्रेन को उदयपुर तक पहुँचाते हैं। वापसी में भी यही प्रक्रिया दोहराई जाती है। इस तरह, एक ही ट्रेन को तीन क्रू चला रहे हैं, जबकि पहले इस ट्रेन को दो क्रू ही चलाते थे। इससे न केवल एक क्रू की बचत होती थी, बल्कि गार्ड और ड्राइवरों को सड़क मार्ग से लाने-ले जाने का खर्च भी बचता था।
इस ट्रेन को चलाने में कई बार संरक्षा नियमों को भी नजरअंदाज किया जा रहा है। कई मौकों पर इस ट्रेन में मालगाड़ी के गार्ड को भेज दिया जाता है, जिन्हें मेल एक्सप्रेस या पैसेंजर ट्रेन चलाने का अनुभव नहीं होता। हाल ही में रविवार को भी ऐसी ही एक ड्यूटी लगाई गई थी।
सप्ताह में दो दिन चलने वाली गाजीपुर-बांद्रा ट्रेन (20942) में भी ऐसी ही अजीब स्थिति है। इस ट्रेन में गंगापुर के ड्राइवर तो रतलाम तक जाते हैं, लेकिन गार्ड कोटा में ही बदल दिया जाता है। कोटा से दूसरा गार्ड ट्रेन को आगे ले जाता है, जबकि गंगापुर का गार्ड तीन घंटे की ड्यूटी के बाद कोटा में 16 घंटे आराम करता है और फिर वापस उसी ट्रेन से गंगापुर लौट जाता है। रनिंग स्टाफ का कहना है कि अगर ड्राइवर रतलाम तक जा सकते हैं, तो गार्ड क्यों नहीं, इससे एक गार्ड की बचत हो सकती है।
इसके अलावा, सागर-मोतीपुरा जैसे स्थानों पर भी कई बार अनावश्यक स्टाफ भेज दिया जाता है, जिससे वहाँ स्टाफ का जमावड़ा लग जाता है और कई बार उन्हें वापस बुलाना पड़ता है, जिससे रेलवे को वित्तीय नुकसान होता है।
कर्मचारियों ने इस मुद्दे को अधिकारियों के सामने उठाया है, लेकिन अभी तक कोई समाधान नहीं निकला है। हालांकि, अब अधिकारी मामले की जाँच करने की बात कह रहे हैं।
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