सवाई माधोपुर।
विश्व प्रसिद्ध रणथम्भौर राष्ट्रीय उद्यान (Ranthambore National Park) से वन्यजीव प्रेमियों और पर्यावरणविदों को विचलित करने वाली एक बड़ी खबर सामने आई है। देशी-विदेशी पर्यटकों की पहली पसंद और देश में सबसे बेहतर टाइगर साइटिंग वाले इस नेशनल पार्क में अब बाघों का कुनबा उनके लिए ही काल साबित हो रहा है। क्षमता से अधिक बाघ-बाघिनों की मौजूदगी के कारण 'टेरिटोरियल फाइट' (इलाके के लिए आपसी संघर्ष) एक आम और जानलेवा बात बन चुकी है।
आंकड़ों के विश्लेषण के मुताबिक, पिछले नौ सालों में रणथम्भौर के घने जंगलों में अपनी सल्तनत (Territory) कायम करने की खूनी जंग में 9 से अधिक बाघ, बाघिनों और मासूम शावकों की मौत हो चुकी है। यानी हर साल औसतन एक बाघ आपसी संघर्ष में दम तोड़ रहा है।
वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (WII) और वन विभाग की आधिकारिक गणना के अनुसार, रणथम्भौर बाघ परियोजना का मुख्य इको-सिस्टम केवल 50 से 55 बाघ-बाघिनों के शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के लिए पर्याप्त है। लेकिन वर्तमान में यहाँ बाघों का दबाव चरम पर है।
रणथम्भौर में वर्तमान बाघों का लाइव गणित:
मुख्य डिवीजन: 21 बाघ, 20 बाघिन और 16 से अधिक शावक।
दूसरा डिवीजन: करीब 10 बाघ-बाघिन और शावक।
धौलपुर का इलाका (रणथम्भौर से जुड़ा क्षेत्र): करीब 10 बाघ-बाघिन और शावक।
नेशनल टाइगर कन्जर्वेशन अथॉरिटी ऑफ इण्डिया (NTCA) की गाइडलाइन के अनुसार, एक वयस्क बाघ या बाघिन को जंगल में स्वतंत्र रूप से विचरण करने, शिकार करने और अपनी टेरेटरी स्थापित करने के लिए कम से कम 20 से 22 वर्ग किलोमीटर का इलाका आवश्यक होता है।
लेकिन रणथम्भौर में 'ओवरपॉपुलेशन' (क्षमता से अधिक संख्या) के कारण यह दायरा घटकर मात्र 14 से 16 वर्ग किलोमीटर सिमट कर रह गया है। नतीजतन, बाघों के शिकार क्षेत्र आपस में टकरा रहे हैं और वर्चस्व की खूनी जंग अनिवार्य होती जा रही है।
वन अधिकारियों ने इस खूनी संघर्ष के पीछे की मुख्य वजह स्पष्ट करते हुए बताया:
ढाई साल का चक्र: शावक आमतौर पर दो से ढाई साल तक अपनी मां (बाघिन) के साथ ही रहते हैं। इस दौरान वे शिकार करने और जंगल में जीवित रहने (Survive) के गुर सीखते हैं।
नई टेरेटरी की तलाश: जब ये युवा शावक अपनी मां से अलग होकर जंगल में अपनी नई सल्तनत बनाने निकलते हैं, तो इनका सामना पहले से ही उस इलाके पर राज कर रहे खूंखार और भारी-भरकम वयस्क बाघों से होता है। इसी क्रिटिकल टाइम पर सबसे अधिक जानलेवा संघर्ष होते हैं, जिसमें युवा शावकों को अपनी जान गंवानी पड़ती है।
वन्यजीव विशेषज्ञों और अधिकारियों के अनुसार, यदि रणथम्भौर के गौरव (बाघों) को बचाना है, तो कागजी दावों से इतर धरातल पर निम्नलिखित तीन सुधारात्मक उपाय तुरंत लागू करने होंगे:
प्राकृतिक टाइगर कॉरिडोर (Tiger Corridor): रणथम्भौर को आस-पास के अन्य अभ्यारण्यों (जैसे रामगढ़ विषधारी, मुकुंदरा या कुनो) से जोड़ने वाले प्राकृतिक रास्तों (Corridors) को पुनर्जीवित और सुरक्षित करना, ताकि युवा बाघ खुद सुरक्षित रूप से नए जंगलों में जा सकें।
गांवों का विस्थापन (Relocation): बाघ परियोजना के कोर और बफर एरिया के आस-पास बसे मानव बस्तियों और गांवों को तुरंत पैकेज देकर सुरक्षित विस्थापित करना, जिससे जंगल का क्षेत्रफल बढ़ सके।
बाघों की शिफ्टिंग (Relocation of Tigers): अत्यधिक आक्रामक या बिना टेरेटरी वाले युवाओं को चिन्हित कर उन्हें कम बाघों वाले अन्य नेशनल पार्कों में एयरलिफ्ट या शिफ्ट करना।
इस गंभीर स्थिति पर 'जी न्यूज़' से बात करते हुए रणथम्भौर बाघ परियोजना के उपवन संरक्षक (DCF) मानस सिंह ने माना कि पार्क इस समय भारी दबाव में है। उन्होंने कहा:
"वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (WII) की रिपोर्ट में रणथम्भौर में क्षमता से अधिक बाघ-बाघिन होने की बात कही गई है, जो पूरी तरह सच है। संख्या अधिक होने के कारण टेरिटोरियल फाइट की आशंका हमेशा बनी रहती है। वन विभाग इस गंभीर चुनौती से निपटने के लिए बाघों के बेहतर मैनेजमेंट और अन्य वन क्षेत्रों के साथ 'नेचुरल कॉरिडोर' विकसित करने की दिशा में लगातार गंभीरता से कार्य कर रहा है।"
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