नई दिल्ली: दिल्ली हाईकोर्ट ने रिश्वत लेने के एक मामले में 90 वर्षीय आरोपी को एक दिन की प्रतीकात्मक जेल की सजा सुनाकर एक अनोखा फैसला दिया है। यह मामला साल 1984 में दर्ज हुआ था और लगभग 40 सालों से अदालतों में विचाराधीन रहा, जो भारतीय न्याय प्रणाली में विलंब का एक बड़ा उदाहरण बन गया है।
न्यायमूर्ति जसमीत सिंह की एकलपीठ का फैसला: न्यायमूर्ति जसमीत सिंह की एकलपीठ ने भारतीय राज्य व्यापार निगम (STC) के तत्कालीन चीफ मार्केटिंग मैनेजर सुरेंद्र कुमार को सत्र न्यायालय द्वारा दी गई तीन साल की सजा को घटाकर केवल एक दिन के कारावास में बदल दिया। न्यायमूर्ति सिंह ने इस मामले को 'विलंबित न्याय प्रणाली' (Delayed Justice System) का एक स्पष्ट उदाहरण बताया और 'स्वॉर्ड ऑफ डैमोकल्स' (Sword of Damocles) के सिद्धांत का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि अपीलकर्ता पर लगभग 40 सालों तक मुकदमा चलता रहा, जो अपने आप में एक मानसिक और भावनात्मक सजा थी।
'स्वॉर्ड ऑफ डैमोकल्स' और अनुच्छेद 21 का उल्लंघन: अदालत ने 'स्वॉर्ड ऑफ डैमोकल्स' को समझाते हुए कहा कि यह उस सतत भय को दर्शाता है जो किसी व्यक्ति पर लंबे समय तक मंडराता रहता है, जैसे किसी के सिर के ऊपर एक पतले धागे से तलवार लटकी हो। न्यायालय ने इसे न्याय के बुनियादी सिद्धांतों के विरुद्ध बताया।
अदालत ने यह भी माना कि दोषी अब 90 साल के हो चुके हैं और कई गंभीर बीमारियों से ग्रस्त हैं। इस उम्र में उन्हें कारावास में डालना उनके जीवन को स्थायी क्षति पहुंचा सकता है। न्यायालय ने विशेष रूप से रेखांकित किया कि इतने लंबे समय तक अपील लंबित रहना संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) का स्पष्ट उल्लंघन है।
क्या था पूरा मामला? यह मामला 1984 का है। सुरेंद्र कुमार पर भारतीय राज्य व्यापार निगम (STC) के तत्कालीन चीफ मार्केटिंग मैनेजर रहते हुए एक निजी फर्म से 15,000 रुपये रिश्वत मांगने का आरोप लगा था। शिकायतकर्ता हामिद ने सीबीआई को इसकी सूचना दी, जिसके बाद छापेमारी में सुरेंद्र कुमार को रंगे हाथों पकड़ा गया था। इसके लगभग 18 साल बाद, साल 2002 में सत्र न्यायालय ने सुरेंद्र कुमार को दोषी ठहराते हुए तीन साल के कारावास और 15,000 रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई थी।
हाईकोर्ट में 22 साल तक लंबित रही अपील: सत्र न्यायालय के इस फैसले के खिलाफ सुरेंद्र कुमार ने दिल्ली हाईकोर्ट में अपील दायर की। यह अपील 22 सालों तक लंबित रही, जबकि निचली अदालत के फैसले तक पहुंचने में ही 19 साल लग गए थे। मामले की सुनवाई के दौरान दिल्ली हाईकोर्ट ने पाया कि दोषी ने साल 2002 में ही सत्र अदालत के फैसले के अनुसार जुर्माना भर दिया है।
इन तमाम पहलुओं पर विचार करते हुए, हाईकोर्ट ने अपील को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए दोषी की सजा को घटाकर एक दिन कर दिया और इसे पहले से पूरी हुई सजा के तौर पर मान लिया। अदालत के अनुसार, इस तरह का विलंबित न्याय न केवल अस्वीकार्य है, बल्कि यह व्यक्ति की गरिमा और संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन भी है।
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