कोटा रेल मंडल में विजिलेंस की कार्रवाई पर फिरा पानी: दलाल-क्लर्कों को सजा के आदेश ढाई महीने से 'गोपनीय शाखा' में दफन

कोटा रेल मंडल में विजिलेंस की कार्रवाई पर फिरा पानी: दलाल-क्लर्कों को सजा के आदेश ढाई महीने से 'गोपनीय शाखा' में दफन

कोटा। भ्रष्टाचार के विरुद्ध 'जीरो टॉलरेंस' का दावा करने वाले रेल प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवालिया निशान खड़े हो गए हैं। भरतपुर में टिकट दलाली करते रंगे हाथों पकड़े गए तीन आरक्षण क्लर्कों को दंडित करने के आदेश जारी हुए ढाई महीने बीत चुके हैं, लेकिन ये आदेश अब तक कोटा से भरतपुर नहीं पहुँच पाए हैं।

कोटा की 'गोपनीय शाखा' में अटकी फाइल

डेढ़ साल तक चली लंबी जांच के बाद प्रशासन ने तीनों क्लर्कों को दोषी पाया। इसके बाद वरिष्ठ मंडल वाणिज्य प्रबंधक (सीनियर डीसीएम) सौरभ जैन ने 13 अक्टूबर को दंड के आदेश जारी किए थे। आदेश के तहत:

  • प्रदीप तिवारी और दौलत राम मीणा: वर्तमान मूल वेतन से दो स्तर नीचे (एक वर्ष के लिए, बिना भविष्य प्रभाव के) अवनत किया गया।

  • राहुल शर्मा: 6 महीने के लिए दो वेतनमान नीचे करने का दंड दिया गया।

हैरानी की बात यह है कि वाणिज्य विभाग से निकलने के बाद ये आदेश मंडल कार्यालय की गोपनीय शाखा में ही अटक कर रह गए हैं। विभागीय सूत्रों की मानें तो आदेशों को दबाने के पीछे किसी बड़ी सांठगांठ की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।

क्या था पूरा मामला?

यह मामला पिछले साल मई का है, जब पश्चिम-मध्य रेलवे की विजिलेंस टीम ने भरतपुर में दो ठिकानों पर एक साथ छापेमारी की थी:

  1. सारस टिकट काउंटर: यहाँ के इंचार्ज दौलत सिंह के पास से तत्काल श्रेणी का एक अवैध आरक्षण टिकट मिला था।

  2. आरक्षण कार्यालय (स्टेशन): यहाँ सुपरवाइजर प्रदीप तिवारी ड्यूटी न होने के बावजूद अन्य कर्मचारी को हटाकर खुद टिकट बनाते पकड़े गए। उनके पास से भी अवैध तत्काल टिकट मिला।

  3. इसी कार्यालय के दूसरे काउंटर पर राहुल शर्मा को भी दलाली के टिकट के साथ पकड़ा गया था। चौंकाने वाली बात यह थी कि एक टिकट का तो ग्राहक ही मौके पर मौजूद नहीं था।

सस्पेंशन से जांच तक का सफर

पकड़े जाने के बाद प्रशासन ने तीनों को तुरंत निलंबित कर दिया था। बाद में उन्हें चार्जशीट थमाई गई और आरक्षण कार्यालय से हटाकर इंक्वारी (जांच) पर लगा दिया गया। डेढ़ साल की जांच में दोष सिद्ध होने के बावजूद, सजा के आदेशों का क्रियान्वयन न होना रेल प्रशासन की मंशा पर गंभीर सवाल उठाता है।


सवाल जो खड़े हो रहे हैं:

  • क्या जानबूझकर इन आदेशों को भरतपुर भेजने में देरी की जा रही है?

  • क्या भ्रष्टाचार के खिलाफ विजिलेंस की मेहनत पर प्रशासनिक सुस्ती भारी पड़ रही है?

  • ढाई महीने तक आदेशों का 'लापता' रहना क्या किसी रसूखदार के दबाव का नतीजा है?


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