इस बार सचिन पायलट के साथ गांधी परिवार खड़ा है। गत वर्ष 14 अगस्त को अशोक गहलोत सरकार ने विधानसभा में बहुमत साबित किया था।

इस बार सचिन पायलट के साथ गांधी परिवार खड़ा है।
गत वर्ष 14 अगस्त को अशोक गहलोत सरकार ने विधानसभा में बहुमत साबित किया था।
राजस्थान में कांग्रेस के अंदरुनी हालात एक साल पहले जैसे ही हैं।
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आज से एक साल पहले 14 अगस्त 2020 को राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने विधानसभा में अपनी सरकार का बहुमत साबित किया था। तब बहुमत साबित करना इसलिए भी आसान हुआ क्योंकि कोई 34 दिन दिल्ली में रहने के बाद बर्खास्त डिप्टी सीएम सचिन पायलट कांग्रेस के 18 विधायकों के साथ वापस जयपुर आ गए थे। 13 अगस्त की रात को सीएमआर में गहलोत और पायलट की मुलाकात हुई और अगले दिन सरकार ने आसानी से बहुमत साबित कर दिया। 18 विधायकों को दिल्ली ले जाने के कारण पायलट को तब कांग्रेस के प्रदेशाध्यक्ष पद से भी हटा दिया गया था। तब गहलोत और पायलट के बीच एक सुलह कमेटी भी बनी, लेकिन इस एक वर्ष की अवधि में गहलोत और पायलट के बीच सुलह नहीं हो पाई है। एक वर्ष पहले पायलट की जो मांगे थीं वो आज भी बनी हुई हैं। कांग्रेस के अंदरुनी हालात एक साल पहले जैसे ही हैं, लेकिन इस बार कांग्रेस का नेतृत्व करने वाला गांधी परिवार सचिन पायलट के साथ खड़ा है। सोनिया गांधी से लेकर राहुल गांधी तक चाहते हैं कि सरकार और संगठन को चलाने में पायलट की भी महत्वपूर्ण भूमिका हो। इसको लेकर अशोक गहलोत को समझाया भी गया है, लेकिन गहलोत की ओर से कोई सकारात्मक रुख सामने नहीं आया है, उल्टे कभी निर्दलीय और कभी बसपा वाले कांग्रेस विधायकों को आगे कर विरोध करवाया जाता है। यदि पायलट को लेकर गहलोत का सकारात्मक रुख होता तो दिल्ली से कुमारी शैलजा और कर्नाटक से डीके शिवकुमार को जयपुर नहीं आना पड़ता। गहलोत लम्बे अर्से से गांधी परिवार से मिलने दिल्ली भी नहीं गए हैं। चूंकि इस बार गांधी परिवार साथ खड़ा है इसलिए सचिन पायलट भी शांत हैं। पायलट गत चार पांच दिनों से जयपुर में ही है, लेकिन उनके समर्थक विधायकों ने कोई प्रतिकूल प्रतिक्रिया नहीं दी है। पायलट ने अपनी मांगों को पूरा करवाने की जिम्मेदारी गांधी परिवार पर ही सौंप दी है। पायलट अब गहलोत से कोई सीधा मुकाबला करने के बजाए गांधी परिवार के साथ या पीछे खड़े होकर गहलोत की रणनीति का सामना करना चाहते हैं। यह सही मौजूदा समीकरण में पायलट के समर्थक विधायकों को हटा कर गहलोत अपनी सरकार चला सकते हैं, लेकिन सवाल उठता है कि क्या दो वर्ष बाद होने वाले विधानसभा चुनाव में पायलट को हटा कर कांग्रेस दोबारा से सरकार बनाने की स्थिति में है? सब जानते हैं कि 2018 के चुनाव में सचिन पायलट की मेहनत से प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनी थी। गांधी परिवार को यह भी पता है कि 2008 से 2013 के अवधि में भी गहलोत ही मुख्यमंत्री थे, लेकिन तब कांग्रेस को 200 में से मात्र 21 सीटें मिली थीं। जोड़ तोड़ कर सरकार चलाना अलग बात है, लेकिन पांच साल राज करने के बाद अपनी पार्टी को दोबारा से शासन में लाना अलग बात है। सरकार तो बिहार में लालू प्रसाद यादव की अनपढ़ पत्नी राबड़ी देवी ने भी चला ली थी। सरकार चलाने का ही नतीजा है कि गहलोत के कई मंत्री निरंकुश और घमंडी हो गए हैं। कांग्रेस को सबसे ज्यादा नुकसान तीन चार मंत्रियों के घमंड से ही उठाना पड़ रहा है। ऐसी घमंडी मंत्रियों की रिपोर्ट भी गांधी परिवार के पास पहुंच गई है और अब ऐसे मंत्रियों को हटाने का दबाव भी गहलोत पर है। सूत्रों के अनुसार संसद का मानसून सत्र भी समाप्त हो गया है, इसलिए गांधी परिवार एक बार फिर राजस्थान की ओर ध्यान लगाएगा।