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राजस्थान में 5 करोड़ 14 लाख को पहली और एक करोड़ 27 लाख नागरिकों को वैक्सीन की दोनों डोज लगने पर मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने अपनी पीठ थपथपाई लेकिन वैक्सीन मुफ्त में मिलने पर केंद्र सरकार का जिक्र तक नहीं।

राजस्थान में 5 करोड़ 14 लाख को पहली और एक करोड़ 27 लाख नागरिकों को वैक्सीन की दोनों डोज लगने पर मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने अपनी पीठ थपथपाई, लेकिन वैक्सीन मुफ्त में मिलने पर केंद्र सरकार का जिक्र तक नहीं।

राजस्थान में 5 करोड़ 14 लाख को पहली और एक करोड़ 27 लाख नागरिकों को वैक्सीन की दोनों डोज लगने पर मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने अपनी पीठ थपथपाई, लेकिन वैक्सीन मुफ्त में मिलने पर केंद्र सरकार का जिक्र तक नहीं।
भूपेंद्र पटेल को बधाई देने के साथ साथ भाजपा की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष वसुंधरा राजे को सबक लेने की भी जरुरत।
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राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट डाल कर बताया है कि 13 सितंबर तक प्रदेश में 5 करोड़ 14 लाख नागरिकों को कोरोना वैक्सीन की पहली डोज लग गई है जो कल आबाद का 73 प्रतिशत है। इसी प्रकार एक करोड़ 27 लाख राजस्थानियों को दोनों डोज लग गई है। यह कुल आबादी का 25 प्रतिशत है। सीएम गहलोत का मानना है कि शेष नागरिकों को भी जल्द वैक्सीन लगाकर संक्रमण की तीसरी लहर की आशंका को समाप्त करेंगे। इसमें कोई दो राय नहीं यह एक बड़ी उपलब्धि है। इसके लिए राज्य सरकार को शाबाशी मिलनी ही चाहिए,
लेकिन सवाल उठता है कि क्या यह उपलब्धि अकेले राज्य सरकार की है? सब जानते हैं कि वैक्सीन केंद्र सरकार की ओर से नि:शुल्क उपलब्ध करवाई जा रही है। यानी जो वैक्सीन केंद्र से मिल रही है उसे ही राजस्थान के नागरिकों को लगाया जा रहा है। लेकिन मुख्यमंत्री गहलोत ने अपनी पोस्ट में केंद्र सरकार से वैक्सीन मिलने का कोई जिक्र नहीं किया है। सब जानते हैं कि पिछले दिनों जब वैक्सीन की सप्लाई में कमी हुई तो सीएम गहलोत और चिकित्सा मंत्री रघु शर्मा ने केंद्र सरकार पर भेदभाव का आरोप लगा दिया। यहां तक कि स्वास्थ्य केंद्रों पर वैक्सीन लगाने का काम तक बंद कर दियागया। आरोप लगाया गया कि राजस्थान में अशोक गहलोत के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार है, इसलिए नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र की भाजपा सरकार भेदभाव कर रही है। यानी केंद्र की बदामी करने में कोई कसर नहीं छोड़ी गई। लेकिन अब अब पर्याप्त मात्रा में वैक्सीन मिल रही है तो राज्य सरकार उपलब्धि के लिए स्वयं ही पीठ थपथपा रही है। पांच करोड़ की आबादी से भी ज्यादा राजस्थानियों को वैक्सीन लगाने पर स्वयं की उपलब्धि ही बताया जा रहा है। जब कमी के समय केंद्र को जिम्मेदार ठहराया जा रहा था तो अब पर्याप्त सप्लाई के लिए केंद्र सरकार को भी श्रेय देना चाहिए।
वसुंधरा राजे सबक लें:
13 सितंबर को जब भूपेंद्र पटेल ने गुजरात के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली तो राजस्थान की पूर्व सीएम और भाजपा की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष वसुंधरा राजे ने भी पटेल को

बधाई दी। सोशल मीडिया के फेसबुक प्लेटफार्म पर राजे ने स्वयं के फोटो के साथ भूपेंद्र पटेल का फोटो भी पोस्ट किया। राजे ने उम्मीद जताई कि पटेल के नेतृत्व में गुजरात का विकास और तेजी से होगा।राजे केंद्र में सत्तारूढ़ भाजपा की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं, इसलिए वे भाजपा शासित राज्य के नए मुख्यमंत्री को
बधाई

देने का हक रखती है, लेकिन सवाल उठता है कि क्या गुजरात के बदलाव से वसुंधरा राजे कोई सबक लेंगी। सब जानते हैं कि गुजरात में भी अगले वर्ष के अंत में विधानसभा के चुनावव होने हैं। लेकिन चुनाव से कुछ माह पहले भाजपा के राष्ट्रीय नेतृत्व ने विजय रुपाणी को हटाकर भूपेंद्र पटेल को मुख्यमंत्री बना दिया। इस बदलाव पर विजय रूपाणी के किसी भी समर्थक विधायक ने यह नहीं कहा कि रुपाणी के बगैर भाजपा का कोई अस्तित्व नहीं है। न ही रुपाणी ने एतराज किया रूपाणी के इस्तीफे के बाद मीडिया में जितने भी नाम चल रहे थे, उन्हें दरकिनार कर पहली बार विधायक बने भूपेंद्र पटेल को मुख्यमंत्री बना दिया गया। यानी अब अगला चुनाव पटेल के नेतृत्व में ही लड़ा जाएगा। भाजपा के राष्ट्रीय नेतृत्व को लगा होगा कि चुनाव में भूपेंद्र पटेल भी जीत दिलवा सकते हैं। इसलिए पुराने चेहरों को हटाकर एक दम नया चेहरा प्रस्तुत कर दिया गया। गुजरात का बदलाव वसुंधरा राजे के लिए राजनीतिक सबक हैं। क्योंकि राजस्थान में राजे के समर्थक वसुंधरा को ही भाजपा समझते हैं, इसमें कोई दो राय नहीं कि राजस्थान में भाजपा को मजबूत करने में राजे की भी भूमिका रही है, लेकिन समर्थकों का यह दावा गलत है कि राजे के बगैर भाजपा नहीं चलेगी। जब राजे यह दावा करती है कि भाजपा उनकी मां के समान है तो उन्हें फिर राष्ट्रीय नेतृत्व के निर्देशों का भी पालन करना चाहिए। 2018 का चुनाव राजस्थान में राजे के नेतृत्व में भी लड़ा गया, लेकिन भाजपा को सफलता नहीं मिली। राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाए जाने के बाद भी राजे की रुचि राजस्थान की राजनीति में ही बनी हुई है। यही वजह है कि राजे भाजपा की मुख्यधारा से अलग है। राजे माने या नहीं, लेकिन उनके समर्थकों की गतिविधियों से भाजपा को नुकसान हो रहा है। वसुंधरा राजे अपने समर्थकों के बयानों पर अंकुश भी नहीं लगवा रही हैं।

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